BLUEiCYMiND Love-Stories

Purushottam Maas Mahatmya Katha from Chapter 21 to 31 : पुरुषोत्तम मास महात्म्य कथा अध्याय 21 से अध्याय 31 तक


सनातन धर्म की दिव्य परंपरा में पुरुषोत्तम मास को साधना, भक्ति और आत्मशुद्धि का सर्वोत्तम काल माना गया है। यह मास भगवान श्रीहरि की विशेष कृपा का प्रतीक है, जिसमें किया गया प्रत्येक शुभ कर्म अनेक गुना फल प्रदान करता है और साधक के जीवन को पवित्रता से भर देता है।

आपने अब तक अध्याय 11 से 20 तक की कथा में भक्ति, तपस्या, धर्मपालन और भगवान की करुणा से जुड़े अनेक प्रेरणादायक प्रसंगों का श्रवण किया। अब आगे अध्याय 21 से 31 तक की कथा में पुरुषोत्तम मास का और भी गहन माहात्म्य, अद्भुत घटनाएँ और जीवन को दिशा देने वाले उपदेश विस्तार से मिलते हैं।

इन अंतिम अध्यायों में यह बताया गया है कि कैसे इस मास का प्रभाव, पापी से पापी जीव का भी उद्धार कर सकता है। कथा के माध्यम से व्रत, दान, तीर्थ, सेवा और सदाचार के महत्व को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से समझाया गया है। साथ ही, यह भी स्पष्ट होता है कि चाहे अनजाने में ही क्यों न हो, यदि कोई पुरुषोत्तम मास का स्पर्श कर लेता है, तो भी वह बड़े फल का अधिकारी बन जाता है।

अब श्रद्धा और भक्ति के साथ पुरुषोत्तम मास महात्म्य कथा के अध्याय 21 से 31 के दिव्य प्रसंगों का रसपान करें और अपने जीवन को धर्ममय तथा पुण्यमय बनाने की प्रेरणा प्राप्त करें।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 21 (कथारूप सार)

बाल्मीकि मुनि बोले, हे राजन्! अब मैं तुम्हें पुरुषोत्तम मास की एक अत्यंत पवित्र और रहस्यमयी कथा सुनाता हूँ, जिसे सुनकर मनुष्य का जीवन धन्य हो जाता है।

प्राचीन समय में एक जिज्ञासु राजा ने मुनियों से पूछा, “हे महर्षियों! भगवान की पूजा का सही स्वरूप क्या है? किस प्रकार की पूजा से भगवान वास्तव में प्रसन्न होते हैं?” तब मुनियों में श्रेष्ठ बाल्मीकि जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “हे राजन्! केवल प्रतिमा स्थापित कर देना ही पर्याप्त नहीं होता, जब तक उसमें विधिपूर्वक प्राणप्रतिष्ठा न की जाए, तब तक वह प्रतिमा केवल धातु के समान ही रहती है।”

उन्होंने आगे कहा, “जो साधक भगवान्‌ के बीज मंत्रों और वैदिक मंत्रों से श्रद्धापूर्वक प्रतिमा में प्राणों का आवाहन करता है, वही उस प्रतिमा को सजीव बना देता है। तब उसमें स्वयं भगवान का निवास हो जाता है।”

यह सुनकर राजा अत्यंत चकित हुआ और बोला, “हे मुनिवर! इसके बाद क्या करना चाहिए?”

बाल्मीकि मुनि बोले, “इसके बाद साधक को अपने मन को एकाग्र करके भगवान पुरुषोत्तम का ध्यान करना चाहिए। वे श्यामवर्ण, श्रीवत्स चिह्न से युक्त, त्रिभंग मुद्रा में, और राधारानी के साथ अत्यंत मनोहर रूप में विराजमान हैं।”

फिर उन्होंने समझाया, “हे राजन्! जब साधक संकल्प लेकर, नियम और पवित्रता के साथ भगवान का षोडशोपचार पूजन करता है, तब वह भगवान के अत्यंत निकट पहुँच जाता है। वह उन्हें आसन देता है, चरण धोने के लिए पाद्य अर्पित करता है, अर्घ्य, आचमन, स्नान और पंचामृत से उनका अभिषेक करता है। फिर उन्हें वस्त्र, चंदन, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करता है।”

मुनि ने आगे कहा, “जब भक्त प्रेमपूर्वक भगवान के अंगों का पूजन उनके विभिन्न नामों से करता है, तब उसका हृदय पूर्णतः भक्ति में डूब जाता है। इसके बाद वह आरती करता है, प्रदक्षिणा करता है और भगवान्‌ की स्तुति करता है।”

राजा ने विनम्रता से पूछा, “हे प्रभो! यदि पूजा में कोई त्रुटि हो जाए तो?”

तब बाल्मीकि जी बोले, “हे राजन्! मनुष्य से भूल होना स्वाभाविक है। इसलिए अंत में ‘मन्त्रहीनं क्रियाहीनं‘ कहकर भगवान्‌ से क्षमा याचना करनी चाहिए। भगवान तो भाव के भूखे हैं, वे सच्चे हृदय की भक्ति को ही स्वीकार करते हैं।”

फिर उन्होंने कहा, “पुरुषोत्तम मास में जो भक्त प्रतिदिन तिल से हवन करता है और घृत का अखंड दीप प्रज्वलित रखता है, उस पर भगवान विशेष कृपा करते हैं।”

अंत में बाल्मीकि मुनि ने कहा, “हे राजन्! जो मनुष्य इस पवित्र पुरुषोत्तम मास में श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ भगवान्‌ श्रीकृष्ण का पूजन करता है, वह इस संसार में सभी सुखों को भोगकर अंत में परम धाम को प्राप्त करता है।”

यह सुनकर राजा का हृदय भक्ति से भर गया और उसने निश्चय किया कि वह भी पुरुषोत्तम मास में विधिपूर्वक भगवान का पूजन करेगा।

इस प्रकार यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा, विधिपूर्वक पूजा और भगवान्‌ के प्रति पूर्ण समर्पण ही जीवन को सफल बनाते हैं।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 22 (कथारूप सार)

एक समय की बात है, धर्मपरायण और जिज्ञासु राजा दृढ़धन्वा के मन में पुरुषोत्तम मास के व्रत को लेकर अनेक प्रश्न उठे। वे जानना चाहते थे कि इस पवित्र मास में कौन-से नियमों का पालन करना चाहिए और किन बातों से दूर रहना चाहिए। वे विनम्र होकर बाल्मीकि मुनि से बोले, “हे तपोधन! कृपा करके मुझे विस्तार से बताइए कि इस व्रत में क्या करना उचित है और क्या त्याज्य है?”

तब भगवान्‌ की प्रेरणा से महर्षि बाल्मीकि ने मुस्कुराते हुए कहा, “हे राजन्! तुमने अत्यंत कल्याणकारी प्रश्न किया है। ध्यानपूर्वक सुनो, मैं तुम्हें पुरुषोत्तम मास के नियम संक्षेप में बताता हूँ।”

उन्होंने आगे कहा, “इस मास में व्रती को संयम और पवित्रता के साथ रहना चाहिए। उसे हविष्य अन्न का सेवन करना चाहिए। ऐसा सादा और सात्विक भोजन जो बिना तेल-मसाले के बना हो और जिसमें शुद्धता हो। यह भोजन उपवास के समान फल देने वाला माना गया है।”

राजा ने पुनः पूछा, “हे मुनिवर! किन वस्तुओं का त्याग करना चाहिए?”

बाल्मीकि जी बोले, “हे राजन्! इस व्रत में मांस, मदिरा, शहद, तिल का तेल, राजमाष, राई और सभी तामसिक पदार्थों का त्याग करना चाहिए। साथ ही, बासी अन्न, दूषित भोजन, और दूसरे के हाथ का अन्न भी नहीं लेना चाहिए। प्याज, लहसुन, गाजर, मूली आदि भी त्याज्य हैं।”

फिर उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, “केवल भोजन ही नहीं, आचरण की शुद्धता भी आवश्यक है। व्रती को किसी से वैर नहीं रखना चाहिए, किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिए। चाहे वह देवता हों, गुरु हों, ब्राह्मण हों या कोई भी प्राणी। पराई स्त्री से दूर रहना, ब्रह्मचर्य का पालन करना और मन, वचन, कर्म से पवित्र रहना, ये सब इस व्रत के मूल आधार हैं।”

राजा अत्यंत ध्यान से सुन रहे थे।

बाल्मीकि मुनि ने आगे कहा, “इस मास में व्रती को पृथ्वी पर शयन करना चाहिए, पत्तल में भोजन करना चाहिए और दिन में एक बार या नियत समय पर ही भोजन करना चाहिए। यदि सामर्थ्य हो तो उपवास, नक्त व्रत या एकभुक्त व्रत का पालन करना चाहिए।”

उन्होंने यह भी बताया, “जो व्यक्ति इस मास में श्रद्धा से भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करता है, श्रीमद्भागवत का श्रवण करता है या तुलसीदल से शालिग्राम का पूजन करता है, उसे अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है।”

फिर उन्होंने एक अद्भुत रहस्य बताया, “हे राजन्! जो इस व्रत का पालन करता है, उसके पास यमदूत भी नहीं आते। उसके शरीर में समस्त तीर्थों और देवताओं का निवास होता है। उसके जीवन से दुःस्वप्न, दरिद्रता और सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।”

राजा यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गया।

अंत में बाल्मीकि मुनि बोले, “हे राजन्! यह पुरुषोत्तम मास का व्रत सौ यज्ञों से भी श्रेष्ठ है। यज्ञ से स्वर्ग मिलता है, परन्तु इस व्रत से भक्त सीधे भगवान के परम धाम गोलोक को प्राप्त होता है।”

यह सुनकर राजा दृढ़धन्वा का हृदय भक्ति से भर गया। उसने निश्चय किया कि वह पूर्ण श्रद्धा और नियम के साथ इस व्रत का पालन करेगा।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 23 (कथारूप सार)

राजा दृढ़धन्वा के मन में एक नई जिज्ञासा उत्पन्न हुई। वे विनम्र होकर बोले, “हे मुनियों में श्रेष्ठ! पुरुषोत्तम मास में दीपदान का क्या फल है? कृपा करके मुझे विस्तार से बताइए।”

उनके इस प्रश्न को सुनकर महर्षि बाल्मीकि अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, “हे राजन्! अब मैं तुम्हें एक ऐसी अद्भुत कथा सुनाता हूँ, जिसे सुनने मात्र से ही बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं।”

उन्होंने कथा आरंभ की-

प्राचीन समय में सौभाग्य नामक नगर में चित्रबाहु नाम का एक प्रतापी राजा राज्य करता था। वह अत्यंत बुद्धिमान, धर्मज्ञ, दयालु और भगवान्‌ श्रीकृष्ण का अनन्य भक्त था। उसकी पत्नी चन्द्रकला भी अत्यंत पतिव्रता, गुणवान और भगवान की भक्त थी। दोनों सुखपूर्वक राज्य का पालन करते थे।

एक दिन उस राज्य में महान ऋषि अगस्त्य पधारे। राजा चित्रबाहु ने दूर से ही उन्हें देखा और दौड़कर उनके चरणों में गिर पड़ा। अत्यंत श्रद्धा से उनका सत्कार किया और विनम्र होकर बोला, “हे मुनिश्रेष्ठ! आज मेरा जीवन सफल हो गया, जो आपके दर्शन हुए।”

राजा की भक्ति और विनम्रता से प्रसन्न होकर अगस्त्य मुनि बोले, “हे राजन्! तुम वास्तव में धन्य हो। तुम्हारा राज्य और प्रजा भी धन्य है, क्योंकि तुम वैष्णवों का सम्मान करते हो। जहाँ भगवान्‌ के भक्तों का आदर नहीं होता, वह स्थान रहने योग्य नहीं होता।”

फिर उन्होंने राजा को आशीर्वाद दिया और जाने को उद्यत हुए। तभी राजा ने विनम्रता से एक प्रश्न किया, “हे मुनिवर! मुझे यह अद्भुत ऐश्वर्य, निष्कंटक राज्य और ऐसी पतिव्रता पत्नी कैसे प्राप्त हुई? अवश्य ही यह किसी पूर्व जन्म के पुण्य का फल है, कृपा करके वह रहस्य मुझे बताइए।”

राजा की जिज्ञासा सुनकर अगस्त्य मुनि ध्यान में लीन हो गए और बोले, “हे राजन्! पूर्व जन्म में तुम मणिग्रीव नामक एक शूद्र थे। तुम अत्यंत पापी, हिंसक और दुष्ट आचरण वाले थे। परन्तु तुम्हारी पत्नी उस समय भी अत्यंत पतिव्रता और धर्मनिष्ठ थी। तुम्हारे पापों के कारण तुम्हें समाज और परिवार ने त्याग दिया, और तुम अपनी पत्नी के साथ वन में रहने लगे।”

उन्होंने आगे कहा, “एक दिन वन में तुम्हें उग्रदेव नाम के एक ब्राह्मण मिले, जो रास्ता भटककर अत्यंत प्यास और थकान से व्याकुल होकर मृत्यु के निकट पहुँच गए थे। उस समय तुम्हारे हृदय में करुणा जागी और तुमने अपनी पत्नी के साथ मिलकर उनकी सेवा की। उन्हें जल दिया, विश्राम कराया और फल-कन्द खिलाए।”

तुम्हारी उस निस्वार्थ सेवा से ब्राह्मण अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने तुम्हें आशीर्वाद दिया और तुम्हारे जीवन का कल्याण किया। उसी पुण्य के प्रभाव से तुम अगले जन्म में राजा चित्रबाहु बने और तुम्हें यह समस्त वैभव और सुख प्राप्त हुआ।

बाल्मीकि मुनि ने कथा समाप्त करते हुए कहा, “हे राजन्! यह सब उस छोटे से पुण्य कार्य का परिणाम है, जो तुमने एक ब्राह्मण की सेवा करके किया था। विशेषकर पुरुषोत्तम मास में किया गया दीपदान और सेवा कार्य अनंत फल देने वाला होता है।”

यह सुनकर राजा दृढ़धन्वा और भी अधिक श्रद्धा से भर गया। उसने समझ लिया कि छोटे-से छोटे पुण्य कार्य भी, यदि श्रद्धा और करुणा से किए जाएँ, तो जीवन को बदल सकते हैं।

इस प्रकार यह कथा हमें सिखाती है कि पुरुषोत्तम मास में किया गया दीपदान, सेवा और भक्ति मनुष्य के जीवन को अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाते हैं और उसे महान फल प्रदान करते हैं।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 24 (कथारूप सार)

बाल्मीकि मुनि बोले, “हे राजन्! अब आगे की कथा सुनो, जो मनुष्य के जीवन को बदल देने वाली है।”

जब उग्रदेव मुनि ने मणिग्रीव से उसके जीवन का वृत्तांत पूछा, तब मणिग्रीव अत्यंत विनम्र होकर बोला, “हे ब्रह्मन्! मैं पहले एक नगर में अपनी धर्मपत्नी के साथ सुखपूर्वक रहता था। मैं धनवान था, अच्छे आचरण वाला था, परोपकारी भी था। किन्तु एक समय मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई। मैंने धर्म का त्याग कर दिया, पराई स्त्री का संग किया, अपवित्र वस्तुओं का सेवन किया और चोरी तथा हिंसा में लिप्त हो गया। इसी कारण मेरे बन्धु-बान्धवों ने मेरा त्याग कर दिया और राजा ने मेरा धन भी छीन लिया। अंततः मैं अपनी पत्नी के साथ इस घोर वन में आकर रहने लगा और जीवों की हत्या करके जीवन यापन करने लगा।”

यह कहते हुए वह अत्यंत दुःखी होकर बोला, “हे मुनिश्रेष्ठ! अब आप ही मुझ पर कृपा करें और ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरी दरिद्रता दूर हो जाए और मैं फिर से सुखी जीवन जी सकूँ।”

मणिग्रीव की करुणा भरी वाणी सुनकर उग्रदेव मुनि प्रसन्न हुए और बोले, “हे वत्स! तुमने मेरी सच्चे मन से सेवा की है, इसलिए मैं तुम्हें एक ऐसा सरल उपाय बताता हूँ, जिससे बिना बड़े व्रत, तीर्थ या दान के ही तुम्हारा कल्याण हो जाएगा।”

उन्होंने आगे कहा, “कुछ समय बाद पवित्र पुरुषोत्तम मास आने वाला है। उस मास में तुम अपनी पत्नी के साथ नियमपूर्वक भगवान पुरुषोत्तम की प्रसन्नता के लिए दीपदान करना। यदि संभव हो तो घृत या तिल के तेल से दीप जलाना, परंतु यदि वह भी उपलब्ध न हो तो इंगुदी के तेल से ही दीपदान करना। नित्य स्नान करके श्रद्धा और भक्ति से यह व्रत करना, इससे तुम्हारी दरिद्रता जड़ से समाप्त हो जाएगी।”

मुनि ने आगे दीपदान का महात्म्य बताते हुए कहा, “हे मणिग्रीव! पुरुषोत्तम मास में किया गया दीपदान इतना महान है कि बड़े-बड़े यज्ञ, दान, तीर्थ और व्रत भी उसके बराबर नहीं हो सकते। यह व्रत धन, धान्य, संतान, यश और सुख देने वाला है। जो जिस फल की इच्छा करता है, वह उसे अवश्य प्राप्त करता है। चाहे वह धन हो, विद्या हो, उत्तम जीवनसाथी हो या मोक्ष ही क्यों न हो।”

यह सुनकर मणिग्रीव और उसकी पत्नी के हृदय में आशा जाग उठी। उन्होंने मुनि के चरणों में प्रणाम किया और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

कुछ समय बाद जब पुरुषोत्तम मास आया, तब दोनों ने पूरे नियम और श्रद्धा के साथ दीपदान करना आरंभ किया। वे प्रतिदिन स्नान करके, भक्ति भाव से भगवान का स्मरण करते हुए इंगुदी के तेल से दीप जलाते रहे। इस प्रकार उन्होंने पूरा मास अत्यंत निष्ठा और प्रेम से बिताया।

उनकी इस सच्ची भक्ति और व्रत के प्रभाव से उनके पाप नष्ट हो गए और मृत्यु के बाद वे स्वर्गलोक को प्राप्त हुए। वहाँ दिव्य सुखों का भोग करने के पश्चात्‌ वे पुनः पृथ्वी पर श्रेष्ठ कुल में जन्मे। वही मणिग्रीव आगे चलकर पराक्रमी राजा चित्रबाहु बना और उसकी पत्नी ही चन्द्रकला के रूप में पुनर्जन्म लेकर उसकी अर्धांगिनी बनी।

उन्हें जो ऐश्वर्य, सुख और निष्कंटक राज्य प्राप्त हुआ, वह सब पुरुषोत्तम मास में किए गए दीपदान का ही फल था।

बाल्मीकि मुनि ने अंत में कहा, “हे राजन्! पुरुषोत्तम मास में किया गया दीपदान मनुष्य के जीवन को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। जो इसे श्रद्धा और नियम से करता है, उसके लिए कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रहती।”


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 25 (कथारूप सार)

राजा दृढ़धन्वा ने विनम्र होकर पूछा, “हे मुनिवर! व्रत तो हमने सुना, पर उसका समापन किस प्रकार करना चाहिए?”

बाल्मीकि मुनि बोले, “हे राजन्! अब मैं तुम्हें पुरुषोत्तम मास के व्रत के समापन अर्थात्‌ उद्यापन की पवित्र विधि कथा के रूप में सुनाता हूँ, जिससे व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।”

मुनि बोले, “हे राजन्! जब पुरुषोत्तम मास पूर्ण होने को आए, तब कृष्ण पक्ष की अष्टमी, नवमी या चतुर्दशी तिथि में श्रद्धा और नियमपूर्वक उद्यापन करना चाहिए।”

उन्होंने आगे कहा, “प्रातःकाल उठकर, स्नान और नित्यकर्म करके, मन को एकाग्र कर भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करना चाहिए। फिर अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को आमंत्रित करना चाहिए। यदि संभव हो तो तीस, अन्यथा सात या पाँच ब्राह्मण भी पर्याप्त हैं।”

मुनि ने विस्तार से समझाते हुए कहा, “मध्याह्न में एक पवित्र मंडल बनाकर उसके ऊपर चार कलश स्थापित करें। उन कलशों में भगवान के चार रूपों वासुदेव, बलराम, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध का आवाहन करें। बीच में राधिका सहित पुरुषोत्तम भगवान्‌ को स्थापित कर विधिपूर्वक पूजा करें।”

फिर उन्होंने कहा, “वैष्णव आचार्य को सम्मानपूर्वक बैठाकर, वस्त्र और आभूषण अर्पित करें। ब्राह्मणों से जप कराएं और चारों दिशाओं में दीपक जलाएं। इसके बाद श्रद्धा से भगवान्‌ को अर्घ्य अर्पित करें और उनके दिव्य स्वरूप का ध्यान करें श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी, हाथ में वंशी धारण किए, राधारानी के साथ विराजमान।”

राजा यह सब सुनकर अत्यंत भावविभोर हो गया।

बाल्मीकि मुनि ने आगे कहा, “पूजन के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराना अत्यंत आवश्यक है। उन्हें प्रेमपूर्वक विविध व्यंजन, फल, मिठाइयाँ अर्पित करें और मधुर वाणी से उनका सत्कार करें। इसके पश्चात दक्षिणा, वस्त्र, गौदान और ताम्बूल देकर उन्हें प्रसन्न करें।”

उन्होंने विशेष रूप से कहा, “यदि संभव हो तो श्रीमद्भागवत का दान अवश्य करें, क्योंकि यह साक्षात्‌ भगवान का स्वरूप माना गया है। इसका दान करने से अनगिनत पुण्य प्राप्त होते हैं और मनुष्य गोलोक धाम को प्राप्त करता है।”

फिर बोले, पूजा के अंत में भगवान्‌ से विनम्रता से क्षमा माँगनी चाहिए, “हे प्रभो! यदि मेरी पूजा में कोई त्रुटि रह गई हो तो कृपा कर उसे पूर्ण करें।” भगवान्‌ अच्युत की कृपा से सभी कमी पूर्ण हो जाती है।

उसके बाद ब्राह्मणों को विदा करके, अपने परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। रात्रि में जागरण कर, पुनः भगवान का स्मरण और पूजन करना चाहिए।

अंत में बाल्मीकि मुनि ने कहा, “हे राजन्! जो स्त्री या पुरुष इस प्रकार श्रद्धा और विधि से पुरुषोत्तम मास का उद्यापन करता है, वह जीवन भर सुख, समृद्धि और सौभाग्य प्राप्त करता है। उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में वह अपने पूर्वजों सहित भगवान के परम धाम गोलोक को प्राप्त होता है।”

यह सुनकर राजा दृढ़धन्वा अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसने निश्चय किया कि वह इस विधि से पुरुषोत्तम मास का व्रत और उसका उद्यापन अवश्य करेगा।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 26 (कथारूप सार)

बाल्मीकि मुनि बोले, हे राजन्! अब मैं तुम्हें पुरुषोत्तम मास के व्रत के अंत में किए जाने वाले नियम-त्याग की पवित्र विधि कथा के रूप में सुनाता हूँ।

राजा दृढ़धन्वा अत्यंत श्रद्धा से सुनने लगे।

मुनि बोले, “हे राजन्! जब पुरुषोत्तम मास का व्रत पूर्ण हो जाए, तब जो नियम व्रती ने पूरे मास में धारण किए हों, उनका विधिपूर्वक त्याग करना चाहिए। यह त्याग भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना व्रत का पालन।”

उन्होंने समझाया, “जो मनुष्य नक्तव्रत करता है, उसे अंत में ब्राह्मणों को भोजन कराकर सुवर्णदान करना चाहिए। जो अमावस्या के दिन भोजन का नियम रखता है, उसे गौदान देना चाहिए। जो आँवले के जल से स्नान करता है, वह दूध या दही का दान करे।”

राजा ने जिज्ञासा से पूछा, “हे मुनिवर! यदि कोई विशेष वस्तुओं का त्याग करे तो?”

बाल्मीकि जी बोले, “हे राजन्! जिसने फलों का नियम किया हो, वह फलों का दान करे। जिसने तेल त्यागा हो, वह घृत का दान करे, और जिसने घृत छोड़ा हो, वह दूध का दान करे। जो भूमि पर सोता रहा हो, वह गद्दे और शय्या का दान करे। जो पत्तल में भोजन करता रहा हो, वह ब्राह्मणों को भोजन कराकर घी और शक्कर का दान दे।”

फिर उन्होंने कहा, “मौनव्रत करने वाला सुवर्ण, तिल और घंटा का दान करे। जिसने जूते का त्याग किया हो, वह जूते का दान करे। जिसने नमक छोड़ा हो, वह विभिन्न रसों का दान करे। और जिसने दीप का त्याग किया हो, वह दीपदान करे।”

राजा यह सब सुनकर आश्चर्यचकित थे कि व्रत का हर नियम किसी न किसी दान से जुड़ा हुआ है।

बाल्मीकि मुनि ने आगे कहा, “हे राजन्! जो इस पुरुषोत्तम मास में भक्ति और नियम से व्रत करता है, वह वैकुण्ठ में स्थान पाता है। यदि कोई पूर्ण विधि से दान करने में समर्थ न हो, तो भी श्रद्धा से किया गया छोटा-सा दान व्रत को पूर्ण कर देता है।”

उन्होंने आगे एक गूढ़ रहस्य बताया, “इस मास में एक समय भोजन करना अत्यंत पवित्र माना गया है। जो व्यक्ति नियमपूर्वक भोजन करता है, उसके बड़े-बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं। जो एकादशी का व्रत करता है, वह अंत में भगवान के धाम को प्राप्त करता है।”

फिर मुनि ने कुशा की महिमा बताते हुए कहा, “कुशा अत्यंत पवित्र है। उनके मूल में ब्रह्मा, मध्य में भगवान्‌ विष्णु और अग्रभाग में भगवान्‌ शिव का निवास माना गया है। इसलिए बिना कुशा के कोई भी धार्मिक क्रिया पूर्ण नहीं मानी जाती।”

अंत में उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, “हे राजन्! व्रत के अंत में ब्राह्मणों को दक्षिणा देना अत्यंत आवश्यक है। यदि कोई दक्षिणा नहीं देता या नियमों का पालन नहीं करता, तो उसका व्रत अधूरा रह जाता है और वह पाप का भागी बनता है।”

इसलिए, हे राजन्! जो मनुष्य श्रद्धा, भक्ति और नियम से पुरुषोत्तम मास का व्रत करता है और अंत में विधिपूर्वक उसका त्याग करता है, वह इस संसार में सुख और समृद्धि प्राप्त कर अंत में भगवान के परम धाम को जाता है।

यह सुनकर राजा दृढ़धन्वा का हृदय श्रद्धा से भर गया और उसने निश्चय किया कि वह इस व्रत को पूरी विधि और नियम के साथ पूर्ण करेगा।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 27 (कथारूप सार)

श्रीनारायण बोले, “हे नारद! जब महर्षि बाल्मीकि ने पुरुषोत्तम मास का समस्त माहात्म्य सुनाया, तब राजा दृढ़धन्वा ने अत्यंत श्रद्धा से उन्हें प्रणाम किया और उनका विधिपूर्वक पूजन किया। मुनि ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया- तुम्हारा कल्याण हो, और सरयू नदी की ओर प्रस्थान कर गए।

राजा भी उन्हें विदा करके अपने महल लौटा, परंतु उसका मन अब संसार से विरक्त हो चुका था। उसने अपनी पत्नी गुणसुन्दरी से कहा, “हे प्रिये! यह संसार राग, द्वेष, लोभ और मोह से भरा हुआ है। यह शरीर भी नश्वर और अशुद्ध है। इससे क्या लाभ? मैं अब इस असार संसार को त्यागकर भगवान पुरुषोत्तम का स्मरण करते हुए वन को जाना चाहता हूँ।”

पति के वचन सुनकर पतिव्रता गुणसुन्दरी ने हाथ जोड़कर कहा, “हे नाथ! जहाँ आप होंगे, वहीं मेरा स्थान है। मैं भी आपके साथ वन जाऊँगी।”

राजा उसकी भक्ति से प्रसन्न हुआ और अपने पुत्र को राज्य सौंपकर पत्नी सहित वन को चला गया। दोनों हिमालय के समीप गंगा तट पर रहने लगे और पुरुषोत्तम मास आने पर कठोर तप करने लगे। राजा निराहार रहकर, एक पैर के अंगूठे पर खड़े होकर, आकाश की ओर दृष्टि लगाए भगवान श्रीकृष्ण का जप करने लगा। रानी भी उसकी सेवा में तत्पर रहकर भक्ति में लीन रही।

जब पुरुषोत्तम मास पूर्ण हुआ, तब वहाँ एक दिव्य विमान प्रकट हुआ। उसमें देवदूतों ने राजा और रानी को बैठने के लिए आमंत्रित किया। जैसे ही वे उसमें बैठे, उनका शरीर दिव्य हो गया और वे दोनों सीधे गोलोक धाम को प्राप्त हुए, जहाँ वे भगवान्‌ के समीप आनंदपूर्वक रहने लगे।

श्रीनारायण बोले, “हे नारद! पुरुषोत्तम मास की महिमा का वर्णन करना अत्यंत कठिन है। जो फल अनेक जन्मों की तपस्या से भी नहीं मिलता, वह इस मास के सेवन से सहज ही प्राप्त हो जाता है। चाहे कोई जानकर या अनजाने में भी इस मास में स्नान, दान या जप कर ले, उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।”

फिर श्रीनारायण ने एक अद्भुत उदाहरण दिया, “एक बार एक दुष्ट वानर ने अनजाने में पुरुषोत्तम मास के दौरान तीन दिन तक केवल स्नान कर लिया। उसी के प्रभाव से उसके समस्त पाप नष्ट हो गए और वह दिव्य शरीर धारण कर गोलोक को चला गया।”

यह सुनकर नारद मुनि अत्यंत आश्चर्यचकित हुए और बोले, “हे प्रभो! यह वानर कौन था? उसने ऐसा कौन-सा पुण्य किया था? कृपा करके विस्तार से बताइए।”

तब श्रीनारायण बोले, “हे नारद! पूर्वकाल में केरल देश में कदर्य नाम का एक अत्यंत लोभी ब्राह्मण रहता था। वह केवल धन संग्रह में लगा रहता था, कभी दान-पुण्य नहीं करता था। उसने न तो यज्ञ किया, न तीर्थ किया, न किसी की सहायता की। यहाँ तक कि अपने परिवार और समाज का भी उसने कभी भला नहीं किया।”

वह अत्यंत कृपण और छल-कपट से भरा हुआ था। एक बगीचे में रहकर वह वहाँ के फलों को चुराकर खाता और बेचता था, तथा झूठ बोलकर अपने स्वामी को धोखा देता था। इस प्रकार उसने जीवनभर केवल पाप ही किए।

जब उसकी मृत्यु हुई, तब यमदूत उसे पकड़कर यमलोक ले गए। वहाँ चित्रगुप्त ने उसके पापों का लेखा-जोखा सुनाया। उसके जीवन में कोई भी पुण्य नहीं था, केवल चोरी और विश्वासघात के पाप थे।

यह सुनकर धर्मराज क्रोधित होकर बोले, “यह दुष्ट कदर्य अपने पापों के कारण हजारों बार वानर योनि में जन्म लेगा।”

इस प्रकार, हे नारद! उस ब्राह्मण ने अपने पापों के कारण वानर योनि को प्राप्त किया। आगे की कथा में तुम सुनोगे कि कैसे उसी वानर को पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से मुक्ति प्राप्त हुई।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 28 (कथारूप सार)

श्रीनारायण बोले, “हे नारद! जब धर्मराज के दरबार में उस लोभी कदर्य ब्राह्मण के पापों का निर्णय हुआ, तब चित्रगुप्त ने अपने दूतों को आदेश दिया कि यह पहले प्रेतयोनि में जाकर अपने कर्मों का दुःख भोगे और उसके बाद वानर शरीर को प्राप्त हो।”

यमदूतों ने वैसा ही किया। वह कदर्य पहले प्रेत बनकर एक निर्जन, भयानक वन में भटकता रहा। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह अत्यंत कष्ट सहता रहा। अपने कर्मों का फल भोगने के बाद वह वानर योनि में जन्मा।

उसका जन्म एक अत्यंत सुंदर पर्वत पर हुआ, जहाँ शीतल जल से भरा एक पवित्र कुण्ड था, जिसे ‘मृगतीर्थ‘ कहा जाता था। यह तीर्थ इतना पवित्र था कि देवता भी वहाँ स्नान करने आते थे। कहा जाता है कि देवताओं ने दैत्यों के भय से कभी मृग रूप धारण कर वहाँ स्नान किया था, इसलिए उसका नाम मृगतीर्थ पड़ा।

किन्तु उस वानर का जीवन अत्यंत कष्टमय था। उसके मुख में भयंकर रोग था, जिससे वह कुछ भी खा नहीं पाता था। वह पेड़ों से फल तोड़ता, पर खा नहीं पाता और वे फल भूमि पर गिर जाते। भूख-प्यास से तड़पता हुआ वह इधर-उधर भटकता रहता।

समय बीतता गया और एक दिन संयोगवश पुरुषोत्तम मास आ गया। उस समय भी वह वानर रोग, भूख और पीड़ा से व्याकुल था।

एक दिन वह प्यास से व्याकुल होकर उस पवित्र कुण्ड के पास पहुँचा, परन्तु दुर्बलता के कारण जल भी नहीं पी सका। वह वृक्षों पर चढ़ता-उतरता रहा और अंततः कुण्ड के पास गिर पड़ा।

दशमी तिथि से लेकर चार दिनों तक वह वानर उस कुण्ड में लोट-पोट करता रहा। उसके शरीर पर बार-बार उस पवित्र जल का स्पर्श होता रहा।

पाँचवें दिन, मध्याह्न के समय, उसने उसी कुण्ड के किनारे अपने प्राण त्याग दिए।

जैसे ही उसने शरीर छोड़ा, उसी क्षण एक अद्भुत चमत्कार हुआ। उस पापी वानर का शरीर दिव्य हो गया। वह नीलकमल के समान श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी, रत्नों से अलंकृत, तेजस्वी दिव्य रूप में प्रकट हुआ।

उसी समय वहाँ एक दिव्य विमान प्रकट हुआ, जिसमें गंधर्व गान कर रहे थे, अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं और मधुर वाद्य बज रहे थे।

उस दिव्य दृश्य को देखकर वह चकित रह गया और मन ही मन सोचने लगा, “मैं तो अत्यंत पापी था, मैंने कोई पुण्य नहीं किया, फिर मुझे यह दिव्य सुख कैसे प्राप्त हुआ?”

तभी भगवान् के दूत वहाँ आए और हाथ जोड़कर विनम्रता से बोले, “हे महाभाग! तुमने पुरुषोत्तम मास में अनजाने में भी इस पवित्र तीर्थ में स्नान किया। उसी के प्रभाव से तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो गए। यह दिव्य विमान उसी पुण्य का फल है।”

यह सुनकर वह आश्चर्य और आनंद से भर गया।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 29 (कथारूप सार)

जब उस पापी कदर्य ब्राह्मण ने वानर शरीर त्यागकर दिव्य देह धारण की, तब भगवान के दूत पुण्यशील और सुशील उससे बोले, “हे महाभाग! अब विलम्ब क्यों करते हो? चलो, हम तुम्हें गोलोक ले चलें, जहाँ पुरुषोत्तम भगवान का साक्षात् सान्निध्य प्राप्त होता है।”

यह सुनकर कदर्य अत्यन्त विनम्र होकर बोला, “हे प्रभो! मैंने जीवन भर अनेक पाप किए हैं। मेरे समान पापी का उद्धार कैसे हुआ? मैंने कौन-सा पुण्य किया, जिससे मुझे यह दिव्य शरीर और यह महान लोक प्राप्त हुआ?”

तब हरिदूतों ने मुस्कराकर कहा, “हे कदर्य! यही पुरुषोत्तम मास का अद्भुत प्रभाव है। तुमने अज्ञानवश ही इस मास में महान तप कर लिया। तुम्हारे मुख में रोग था, इसलिए तुमने अनजाने में उपवास किया। तुमने वृक्षों से फल तोड़कर भूमि पर फेंके, जिससे अन्य जीवों का पेट भरा। यह परोपकार बन गया। भूख-प्यास, शीत और धूप सहते हुए तुमने कठोर तप सहा। और सबसे बढ़कर, तुम उस पवित्र तीर्थ में कई दिनों तक जल में लोटते रहे, जिससे तुम्हें स्नान का पुण्य प्राप्त हुआ। इस प्रकार बिना जाने ही तुमसे ऐसा महान व्रत हो गया, जिसने तुम्हारे समस्त पापों को नष्ट कर दिया।”

यह सुनकर कदर्य आश्चर्य और आनन्द से भर गया। उसने उस तीर्थ, पर्वत, वन और वृक्षों को प्रणाम किया और विनम्रतापूर्वक दिव्य विमान में बैठ गया। देवताओं ने पुष्पवृष्टि की, गन्धर्वों ने गीत गाए और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। इस प्रकार वह परम आनन्दमय गोलोक को प्राप्त हुआ, जहाँ न दुःख है, न जन्म-मरण का भय।

इसके बाद नारद मुनि ने भगवान से पूछा, “हे प्रभो! आपने प्रातःकाल के कर्तव्यों का वर्णन किया, अब कृपया बताइए कि दिन और रात्रि में मनुष्य को कैसे आचरण करना चाहिए?”

तब श्रीनारायण ने गृहस्थ धर्म का उपदेश देते हुए कहा कि मनुष्य को संध्या, तर्पण और पंचमहायज्ञ करना चाहिए। अतिथि को देवता मानकर उसका सत्कार करना चाहिए और भिक्षु-ब्रह्मचारी को पहले भोजन देना चाहिए। स्वयं शुद्ध और संयमपूर्वक भोजन करना चाहिए। भोजन के पश्चात् भगवान का स्मरण, शास्त्र-श्रवण और आत्मचिन्तन करना चाहिए।

सायंकाल में संध्या-वंदन, जप और हवन करना चाहिए और रात्रि में धर्मपूर्वक आचरण करते हुए विश्राम करना चाहिए।

अंत में श्रीनारायण ने कहा कि अहिंसा, सत्य, दया, दान और संयम यही गृहस्थ धर्म के मूल स्तम्भ हैं। जो मनुष्य इनका पालन करता है, वही सच्चा धर्मात्मा है और जीवन में परम कल्याण को प्राप्त करता है।

इस प्रकार यह कथा बताती है कि पुरुषोत्तम मास का प्रभाव इतना महान है कि अनजाने में किया गया छोटा-सा पुण्य भी मनुष्य को मोक्ष के मार्ग पर ले जा सकता है।

इस प्रकार, केवल पुरुषोत्तम मास में अनजाने में किए गए स्नान मात्र से भी वह पापी कदर्य ब्राह्मण वानर योनि से मुक्त होकर दिव्य लोक को प्राप्त हुआ।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 30 (कथारूप सार)

नारदजी ने विनम्र भाव से भगवान नारायण से पूछा, “हे प्रभो! आपने पतिव्रता स्त्रियों की महिमा तो बताई, अब उनके लक्षणों को विस्तार से कहिए।” यह सुनकर भगवान नारायण मुस्कुराए और बोले, “हे नारद! सुनो, मैं तुम्हें सच्ची पतिव्रता स्त्री के गुणों का वर्णन करता हूँ।‘

उन्होंने कहा कि सच्ची पतिव्रता स्त्री वही है, जो अपने पति को ही परम देवता मानती है। चाहे पति रूपवान हो या कुरूप, धनी हो या निर्धन, ज्ञानी हो या अज्ञानी, वह हर परिस्थिति में उसके प्रति श्रद्धा, सेवा और समर्पण का भाव रखती है। वह अपने मन, वचन और कर्म से पति का आदर करती है और कभी भी कठोर वाणी का प्रयोग नहीं करती।

भगवान ने आगे बताया कि ऐसी स्त्री अपने मन को संयम में रखती है। वह किसी अन्य पुरुष की ओर आकर्षित नहीं होती, न ही किसी प्रकार के प्रलोभन से विचलित होती है। उसकी निष्ठा इतनी दृढ़ होती है कि वह केवल अपने पति के सुख-दुख में ही अपना जीवन समर्पित कर देती है। पति के प्रसन्न होने पर वह प्रसन्न होती है और उसके दुःख में स्वयं भी दुःखी हो जाती है।

पतिव्रता स्त्री का जीवन अत्यंत मर्यादित और अनुशासित होता है। वह घर के कार्यों को कुशलता से संभालती है, सास-ससुर की सेवा करती है, और परिवार में प्रेम एवं शांति बनाए रखती है। वह अपने व्यवहार से घर को स्वर्ग समान बना देती है। पति के आने पर उसका आदर करना, समय पर भोजन देना, मधुर वचन बोलना, ये उसके स्वभाव में ही शामिल होते हैं।

भगवान नारायण ने यह भी बताया कि ऐसी स्त्री अपने आचरण में अत्यंत सावधानी रखती है। वह व्यर्थ हँसी-मजाक, क्रोध, ईर्ष्या और असंयम से दूर रहती है। यदि पति कहीं बाहर चला जाए, तो वह उसके कल्याण के लिए प्रार्थना करती है और स्वयं सादगी से जीवन बिताती है।

उन्होंने गर्भवती स्त्री के लिए भी नियम बताए, उसे सदैव शुद्ध, प्रसन्न और संयमित रहना चाहिए, ताकि उत्तम संतान की प्राप्ति हो। वहीं विधवा स्त्री के लिए भी संयम, साधना और सादगीपूर्ण जीवन को श्रेष्ठ बताया गया है।

भगवान नारायण ने अंत में कहा, “हे नारद! इस संसार में पति के समान स्त्री के लिए कोई देवता नहीं है। पति की प्रसन्नता से ही स्त्री को सुख, समृद्धि, संतान और यश प्राप्त होता है। जो स्त्री अपने धर्म का पालन करती है, वह न केवल इस लोक में सुख भोगती है, बल्कि परलोक में भी उच्च स्थान प्राप्त करती है।”


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 31 (कथारूप सार)

सूतजी बोले, “हे विप्रों! जब नारद मुनि ने पतिव्रता धर्म का अद्भुत वर्णन सुना, तो उनके हृदय में एक और जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उन्होंने विनम्रता से भगवान नारायण से पूछा, “हे प्रभो! आपने अनेक दानों का महत्व बताया, परन्तु काँसे के सम्पुट के दान को सबसे श्रेष्ठ कहा है। कृपा करके उसके रहस्य को विस्तार से बताइए।”

भगवान नारायण ने प्रसन्न होकर कहा, “हे नारद! प्राचीन काल में एक बार माता पार्वती ने भी पुरुषोत्तम मास का व्रत किया था। व्रत की समाप्ति पर उन्होंने भगवान शिव से पूछा कि इस व्रत को पूर्ण करने के लिए कौन-सा दान सर्वोत्तम है, जिससे सम्पूर्ण फल प्राप्त हो।”

तब भगवान शिव ने गहन ध्यान कर उत्तर दिया, “हे पार्वती! पुरुषोत्तम मास इतना महान है कि इसमें अन्य सभी दान गौण हो जाते हैं। इस व्रत की पूर्णता के लिए ‘सम्पुट दान‘ का विधान है। ब्रह्माण्ड के समान उस सम्पुट का दान अत्यंत दुर्लभ है, इसलिए उसके स्थान पर काँसे का सम्पुट बनाकर उसमें 30 मालपुए रखकर, विधिपूर्वक पूजन कर, योग्य ब्राह्मण को अर्पित करना चाहिए। यदि सामर्थ्य हो तो ऐसे 30 सम्पुटों का दान करना उत्तम माना गया है।”

भगवान शिव के वचनों को सुनकर माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने श्रद्धापूर्वक वही दान कर अपने व्रत को पूर्ण किया।

यह कथा सुनकर नारद मुनि का हृदय भक्ति से भर उठा। उन्होंने कहा, “हे प्रभो! अब मुझे पूर्ण विश्वास हो गया है कि पुरुषोत्तम मास सभी साधनों में श्रेष्ठ है। केवल इसका श्रवण ही मनुष्य के पापों का नाश कर देता है, तो जो श्रद्धा और विधि से इसका पालन करता है, उसके पुण्य का तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता।”

सूतजी आगे कहते हैं, जो मनुष्य इस भारतभूमि में जन्म लेकर भी इस पवित्र पुरुषोत्तम मास का पालन नहीं करते, वे जीवनभर दुःखों के चक्र में फँसे रहते हैं। इसलिए इस मास में सत्य बोलना, दान देना, ब्राह्मणों का सत्कार करना और भगवान का भजन करना अत्यंत आवश्यक है।

इस मास में विशेष रूप से भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान और पूजन करना चाहिए। श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी, मुरलीधर, राधिका सहित पुरुषोत्तम भगवान का स्मरण करने से मनुष्य के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

सूतजी ने यह भी कहा कि इस माहात्म्य का श्रवण, पठन और लेखन अत्यंत फलदायक है। जो इसे लिखकर, सजाकर ब्राह्मण को दान देता है, वह अपने कुलों का उद्धार कर दुर्लभ गोलोक धाम को प्राप्त करता है। यहाँ तक कि एक श्लोक का श्रवण भी महान पापों को नष्ट करने वाला है।

यह दिव्य कथा सुनकर नैमिषारण्य के सभी ऋषि-मुनि अत्यंत प्रसन्न हो उठे। उन्होंने सूतजी की महिमा का गुणगान किया और उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे सदा इसी प्रकार भगवान की पावन कथाओं का प्रसार करते रहें।

इस प्रकार यह पुरुषोत्तम मास का माहात्म्य कल्पवृक्ष के समान है। जो भी श्रद्धा से इसका आश्रय लेता है, वह अपने सभी अभिलाषित फल प्राप्त कर अंततः भगवान के दिव्य धाम को प्राप्त होता है।


Source: narayanseva.org

Read in Hindi - Purushottam Maas Mahatmya Katha in 3 parts :







Purushottam Maas Mahatmya Katha from Chapter 11 to 20 : पुरुषोत्तम मास महात्म्य कथा अध्याय 11 से अध्याय 20 तक



सनातन धर्म की पावन परंपराओं में पुरुषोत्तम मास का स्थान अत्यंत उच्च और कल्याणकारी माना गया है। यह मास भगवान श्रीहरि की विशेष कृपा प्राप्त करने का दुर्लभ अवसर है। इस दिव्य काल में किए गए जप, तप, दान और व्रत साधक के जीवन को पवित्र बनाते हैं और उसे भौतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करते हैं।

अभी तक आपने पुरुषोत्तम मास की महिमा अध्याय 1 से 10 तक की कथा में, उसकी उत्पत्ति और भगवान की अनुकंपा के अनेक अद्भुत प्रसंगों का श्रवण किया। अब आगे बढ़ते हुए अध्याय 11 से 20 तक की कथा में और भी गूढ़ रहस्य, प्रेरणादायक प्रसंग तथा धर्म, भक्ति और तपस्या के उच्च आदर्शों का विस्तार से वर्णन मिलता है।

अब श्रद्धा और भक्ति के साथ पुरुषोत्तम मास महात्म्य कथा के अध्याय 11 से 20 के दिव्य प्रसंगों का रसपान करें और अपने जीवन को धर्ममय तथा पुण्यमय बनाने की प्रेरणा प्राप्त करें।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 11 (कथारूप सार)

सूतजी बोले, हे मुनिश्रेष्ठ! अब मैं आपको उस अद्भुत कथा का सार सुनाता हूँ, जिसमें एक तपस्विनी कन्या की कठोर साधना, भगवान शंकर की कृपा और पुरुषोत्तम मास के महत्त्व का गूढ़ रहस्य प्रकट होता है।

नारदजी के प्रश्न करने पर श्रीनारायण बोले: एक समय एक ऋषि की कन्या ने भगवान शिव को पति रूप में पाने की इच्छा से अत्यंत कठिन तपस्या आरम्भ की। वह कन्या अत्यंत दृढ़ निश्चयी और धैर्यवान थी। उसने ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि के मध्य बैठकर तप किया, शीतकाल में ठंडे जल में खड़ी रही और वर्षा ऋतु में खुले आकाश के नीचे बिना किसी आश्रय के निवास किया। इस प्रकार उसने हजारों वर्षों तक तप करते हुए अपने शरीर को क्षीण कर लिया, परंतु उसकी भक्ति और संकल्प अडिग रहे।

उसकी ऐसी कठोर तपस्या को देखकर देवराज इन्द्र भी चिंतित हो उठे, किन्तु वह कन्या अपने लक्ष्य से तनिक भी विचलित नहीं हुई। अंततः उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर उसके समक्ष प्रकट हुए। उनके दिव्य स्वरूप के दर्शन पाकर वह कन्या अत्यंत प्रसन्न हुई और विनम्र भाव से उनकी स्तुति करने लगी। उसने भगवान शिव को दुखों का नाश करने वाले और भक्तों के रक्षक के रूप में प्रणाम किया।

भगवान शंकर उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर बोले, “हे तपस्विनी! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, तुम जो चाहो वर मांगो।”

यह सुनकर वह कन्या अत्यंत हर्षित हुई और बार-बार एक ही वर मांगने लगी, “हे प्रभो! मुझे पति दीजिए, मुझे पति दीजिए।” उसने अपनी इस इच्छा को पाँच बार दोहराया।

तब भगवान शंकर ने मुस्कराकर कहा, “हे सुन्दरी! तुमने पाँच बार पति माँगा है, इसलिए अगले जन्म में तुम्हें पाँच पति प्राप्त होंगे। वे सभी वीर, धर्मज्ञ और गुणवान होंगे।”

यह सुनते ही कन्या व्याकुल हो उठी। वह हाथ जोड़कर बोली, “हे प्रभु! संसार में एक स्त्री का एक ही पति होता है, पाँच पति होना तो लोकविरुद्ध है। कृपया मुझे ऐसा वर न दें जिससे मेरी हँसी हो।”

तब भगवान शंकर गंभीर होकर बोले, “हे बाले! यह सब तुम्हारे पूर्व कर्मों का फल है। तुमने पूर्व जन्म में महर्षि दुर्वासा का अपमान किया और पुरुषोत्तम मास का अनादर किया। उसी के कारण तुम्हें यह फल प्राप्त होगा। इस जन्म में तुम्हें पति सुख नहीं मिलेगा, पर अगले जन्म में तुम बिना योनि के उत्पन्न होकर पाँच पतियों का सुख भोगोगी और अंत में परम पद को प्राप्त करोगी।”

शिवजी ने आगे कहा, “पुरुषोत्तम मास अत्यंत पवित्र और कल्याणकारी है। जो इसका श्रद्धा से पालन करता है, वह सुख, समृद्धि और मोक्ष को प्राप्त करता है। परंतु जो इसका अपमान करता है, उसे विपरीत फल भोगना पड़ता है।”

ऐसा कहकर भगवान शंकर वहाँ से अंतर्धान हो गए। उनके चले जाने पर वह कन्या अत्यंत दुःखी और चिंतित हो गई, मानो कोई मृगी अपने समूह से बिछुड़ गई हो।

सूतजी बोले- हे मुनियों! इस प्रकार यह कथा हमें यह शिक्षा देती है कि भक्ति और तपस्या का फल अवश्य मिलता है, किन्तु धर्म के नियमों और पुरुषोत्तम मास के महत्व को समझकर उसका पालन करना भी अत्यंत आवश्यक है।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 12 (कथारूप सार)

सूतजी बोले- हे मुनिश्रेष्ठ! अब मैं आपको उस कथा का सार सुनाता हूँ, जिसमें उस तपस्विनी कन्या के अगले जन्म, द्रौपदी के जीवन और पुरुषोत्तम मास के महान प्रभाव का अद्भुत वर्णन है।

नारदजी ने विनम्र होकर पूछा, “हे प्रभो! जब भगवान शंकर अंतर्धान हो गए, तब उस बाला ने शोक में क्या किया?”

तब श्रीनारायण बोले, “हे नारद! यही प्रश्न एक बार राजा युधिष्ठिर ने भी भगवान श्रीकृष्ण से किया था, अब वही कथा मैं तुम्हें सुनाता हूँ।”

श्रीकृष्ण बोले, “हे राजन्! शिवजी के चले जाने पर वह कन्या अत्यंत दुखी हो गई। वह भय और शोक से व्याकुल होकर रोने लगी। उसका शरीर तपस्या से पहले ही क्षीण था, अब दुःख की अग्नि ने उसे और भी जला दिया। वह ऐसे प्रतीत होती थी जैसे वनाग्नि में जली हुई कोई लता। समय बीतता गया और अंततः काल के प्रभाव से वह अपने आश्रम में ही शरीर त्याग कर बैठी।”

“हे राजन्! उसी समय यज्ञसेन नामक राजा ने एक महान यज्ञ किया। उस यज्ञकुण्ड से एक दिव्य तेजस्विनी कन्या उत्पन्न हुई। वही कन्या आगे चलकर राजा द्रुपद की पुत्री ‘द्रौपदी‘ के नाम से प्रसिद्ध हुई। पूर्व जन्म की वही तपस्विनी कन्या अब द्रौपदी के रूप में जन्मी थी।”

“उसका स्वयंवर हुआ, जिसमें अर्जुन ने मछली की आँख भेदकर उसे प्राप्त किया। परंतु आगे चलकर उसे अत्यंत कष्टों का सामना करना पड़ा। दुर्योधन के सभा में दुःशासन ने उसके केश पकड़कर उसे अपमानित किया। उस समय उसने अत्यंत व्याकुल होकर मुझे पुकारा, “हे कृष्ण! हे दीनबंधु! अब मेरा कोई नहीं, आप ही मेरे रक्षक हैं।”

“प्रथम पुकार में मैंने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि उसने पूर्व में पुरुषोत्तम मास का अनादर किया था। परंतु जब उसने पूर्ण समर्पण भाव से पुनः मुझे पुकारा, तब मैं तुरंत वहाँ पहुँचा और उसकी लाज की रक्षा की।”

श्रीकृष्ण आगे बोले, “हे राजन्! द्रौपदी मेरी अत्यंत प्रिय भक्त थी, परंतु पुरुषोत्तम मास का अपमान करने के कारण उसे कष्ट सहना पड़ा। जो पुरुषोत्तम का तिरस्कार करता है, उसका पतन निश्चित है। और जो भक्तों को पीड़ा देता है, वह मेरा सबसे बड़ा शत्रु होता है।”

इसके बाद श्रीकृष्ण ने पाण्डवों को आश्वासन दिया कि वे उनके शत्रुओं का नाश करेंगे और उन्हें पुनः राज्य प्राप्त होगा। उन्होंने कहा, “हे पाण्डवों! तुम पुरुषोत्तम मास का विधिपूर्वक व्रत और पूजन करो, इससे तुम्हारा कल्याण होगा।‘

फिर श्रीकृष्ण द्वारका जाने लगे। पाण्डव अत्यंत भावुक होकर बोले, “हे प्रभु! आप ही हमारे जीवन हैं, हमें कभी मत भूलिए।”

श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक उन्हें समझाकर द्वारका लौट गए। उनके जाने के बाद पाण्डवों ने तीर्थों में भ्रमण किया और पुरुषोत्तम मास आने पर विधिपूर्वक व्रत किया। चौदह वर्षों के पश्चात् श्रीकृष्ण की कृपा से उन्होंने अपना राज्य पुनः प्राप्त किया।

सूतजी अंत में कहते हैं, “हे मुनियों! पुरुषोत्तम मास का माहात्म्य इतना महान है कि उसे पूर्ण रूप से कोई नहीं जान सकता। स्वयं भगवान ही इसके सम्पूर्ण प्रभाव को जानते हैं। जो मनुष्य श्रद्धा और नियमपूर्वक इस मास का पालन करता है, वही वास्तव में धन्य और पूजनीय होता है।”


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 13 (कथारूप सार)

सूतजी बोले, “हे मुनिश्रेष्ठो! अब मैं आपको उस पवित्र कथा का सार सुनाता हूँ, जिसमें धर्मात्मा राजा दृढ़धन्वा के जीवन, उनके वैभव और अंतर्मन में उठे वैराग्य के भाव का अद्भुत वर्णन है।”

ऋषियों ने विनम्र होकर कहा, “हे सूतजी! पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से राजा दृढ़धन्वा ने कैसे राज्य, परिवार और अंत में भगवान का परमधाम प्राप्त किया? कृपा करके इस कथा को विस्तार से कहिए।”

तब सूतजी बोले, “हे विप्रों! यह कथा स्वयं भगवान नारायण ने नारदजी से कही थी, वही अब मैं आप सभी को सुनाता हूँ।”

श्रीनारायण बोले, “हे नारद! हैहय देश में चित्रधर्मा नाम का एक धर्मात्मा और प्रतापी राजा था। उसका पुत्र दृढ़धन्वा अत्यंत तेजस्वी, सत्यवादी, धर्मपरायण और गुणों से युक्त था। वह बाल्यावस्था से ही अत्यंत बुद्धिमान था और गुरु से वेद-शास्त्रों का अध्ययन कर, उनकी आज्ञा लेकर अपने पिता के पास लौट आया। उसे देखकर राजा चित्रधर्मा अत्यंत प्रसन्न हुए।”

समय आने पर राजा चित्रधर्मा ने वैराग्य धारण किया और राज्य का भार दृढ़धन्वा को सौंपकर स्वयं वन में तप करने चले गए। वहाँ भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए उन्होंने तप किया और अंततः परमधाम को प्राप्त हुए।

पिता के वियोग से राजा दृढ़धन्वा को शोक हुआ, परंतु उन्होंने धर्म के अनुसार सभी संस्कार पूर्ण किए और फिर राज्य संचालन में लग गए। वे अत्यंत न्यायप्रिय, पराक्रमी और गुणवान राजा थे। उनकी पत्नी गुणसुन्दरी अत्यंत रूपवती और पतिव्रता थी, जिनसे उन्हें चार वीर पुत्र और एक कन्या प्राप्त हुई।

राजा दृढ़धन्वा के राज्य में सुख-समृद्धि थी। वे विद्या, शौर्य और नीति में निपुण थे, तथा अपने शत्रुओं का नाश करने वाले थे। परंतु एक दिन उनके मन में एक गहरी चिंता उत्पन्न हुई।

एक रात्रि उन्होंने सोचा, “मैंने न तो कोई विशेष तप किया, न दान दिया, न यज्ञ किया, फिर भी मुझे इतना वैभव कैसे प्राप्त हुआ? इसका कारण क्या है?”

इस प्रश्न ने उनके मन को व्याकुल कर दिया। अगले दिन वे वन में शिकार के लिए गए। वहाँ एक मृग का पीछा करते-करते वे गहन वन में पहुँच गए। प्यास से व्याकुल होकर उन्होंने एक सरोवर से जल पिया और एक विशाल वटवृक्ष के नीचे विश्राम करने लगे।

उसी समय वहाँ एक अद्भुत तोता (शुक पक्षी) आया, जो मनुष्य की वाणी में एक गूढ़ श्लोक बार-बार बोलने लगा, “हे मनुष्य! इस संसार के क्षणभंगुर सुखों में फँसकर तू आत्मतत्त्व का चिंतन नहीं करता, तो इस संसार-सागर से पार कैसे होगा?”

उस श्लोक को सुनकर राजा चकित और मोहित हो गए। वे सोचने लगे, “क्या यह कोई दिव्य पुरुष है? क्या यह स्वयं शुकदेवजी हैं, जो मेरा उद्धार करने आए हैं?”

इतने में उनकी सेना वहाँ पहुँच गई और वह शुक पक्षी अंतर्धान हो गया।

राजा उस गूढ़ वचन को मन में धारण कर अपने नगर लौट आए। अब उनका मन संसार से हटने लगा। वे मौन रहने लगे, भोजन त्याग दिया और किसी से बात नहीं करते थे।

उनकी यह अवस्था देखकर रानी गुणसुन्दरी अत्यंत चिंतित हुई। उसने विनम्रता से पूछा, “हे स्वामी! आपको क्या चिंता है? आप मौन क्यों हैं? कृपया अपने मन की बात कहिए।”

परंतु राजा उस शुक के वचनों में इतने डूबे हुए थे कि उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। रानी भी उनके दुःख का कारण न जान सकी और अत्यंत व्याकुल रहने लगी।

इस प्रकार राजा दृढ़धन्वा गहन चिंतन और वैराग्य में डूबे रहे, और उनके जीवन में अब एक नया मोड़ आने वाला था।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 14 (कथारूप सार)

श्रीनारायण बोले, “हे नारद! अब आगे की कथा सुनो। राजा दृढ़धन्वा, जो शुक पक्षी के वचनों से अत्यंत चिंतित थे, उसी समय उनके महल में महर्षि वाल्मीकि पधारे।”

राजा ने दूर से ही उन्हें आते देखा तो तुरंत उठकर अत्यंत विनम्रता और श्रद्धा से उनके चरणों में दण्डवत प्रणाम किया। विधिपूर्वक उनका पूजन कर उन्हें उच्च आसन पर बैठाया, उनके चरणों को अपने हाथों से धोकर उस चरणामृत को बड़े हर्ष से अपने मस्तक पर धारण किया।

फिर शुक पक्षी की बात स्मरण करते हुए मधुर वाणी में बोले, “हे भगवन्! आज मैं धन्य हो गया हूँ। आपके दर्शन से मेरा जीवन सफल हो गया। आज मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हो गए हैं। आपके दर्शन से शास्त्रों का सार समझ में आ गया है। मेरे सौभाग्य का वर्णन करना भी कठिन है।”

राजा के विनम्र वचन सुनकर महर्षि वाल्मीकि अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, “हे राजन्! तुम इतने चिंतित क्यों हो? अपने मन की शंका निःसंकोच कहो, जिससे उसका समाधान हो सके।”

तब राजा दृढ़धन्वा बोले, “हे मुनिवर! आपके चरणों की कृपा से सब कुछ सुखद है, परंतु मेरे हृदय में एक गहरा संदेह उत्पन्न हो गया है। वन में एक शुक पक्षी ने मुझे एक रहस्यमयी वचन कहा, “इस संसार के अतुल सुखों में डूबकर तू आत्मतत्त्व का चिंतन नहीं करता, तो संसार-सागर से पार कैसे होगा?”

हे प्रभो! मैं उस वचन का अर्थ नहीं समझ पाया। साथ ही यह भी जानना चाहता हूँ कि मुझे यह राज्य, परिवार और वैभव किस पुण्य के कारण प्राप्त हुआ है?

राजा की बात सुनकर महर्षि वाल्मीकि ने ध्यान लगाकर उनके पूर्व जन्म का ज्ञान प्राप्त किया और बोले, “हे राजन्! पूर्व जन्म में तुम द्रविड़ देश में ताम्रपर्णी नदी के तट पर रहने वाले ‘सुदेव‘ नामक ब्राह्मण थे। तुम धर्मपरायण, सत्यवादी और भगवान विष्णु के भक्त थे। तुम्हारी पत्नी गौतमी अत्यंत पतिव्रता और सेवा में तत्पर थी।”

किन्तु तुम दोनों को संतान नहीं थी। इस कारण तुम अत्यंत दुःखी रहते थे। एक दिन तुमने अपनी पत्नी से कहा, ‘पुत्र के बिना जीवन व्यर्थ है।‘

तब तुम्हारी पत्नी गौतमी ने धैर्यपूर्वक समझाया, “हे स्वामी! आप जैसे ज्ञानी को पुत्र की इच्छा नहीं करनी चाहिए। यदि आपको संतान की कामना है, तो भगवान विष्णु की आराधना कीजिए।”

पत्नी के वचन सुनकर तुमने निश्चय किया और दोनों मिलकर ताम्रपर्णी नदी के तट पर जाकर कठोर तपस्या आरम्भ की। तुम पाँच-पाँच दिन में केवल सूखे पत्तों और जल का सेवन करते थे। इस प्रकार चार हजार वर्षों तक कठोर तप करते रहे, जिससे तीनों लोक विचलित हो उठे।

तुम्हारी इस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर तुम्हारे सामने प्रकट हुए। उनका स्वरूप अत्यंत दिव्य और मनोहर था। उन्हें देखकर तुम अत्यंत प्रसन्न हुए और साष्टांग प्रणाम कर उनकी स्तुति करने लगे।

श्रीनारायण बोले, “हे नारद! इस प्रकार उस ब्राह्मण सुदेव की तपस्या और भगवान के प्रति उसकी भक्ति के कारण उसे अगले जन्म में राजा दृढ़धन्वा के रूप में जन्म मिला और उसे यह वैभव प्राप्त हुआ।”


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 15 (कथारूप सार)

श्रीनारायण बोले, “हे नारद! अब आगे की कथा सुनो। जब भगवान हरि सुदेव ब्राह्मण के सामने प्रकट हुए, तब वह अत्यंत भावविभोर होकर हाथ जोड़ गद्गद वाणी में उनकी स्तुति करने लगा।

वह बोला, “हे देवों के देव! हे त्रैलोक्य के रक्षक! मैं आपकी शरण में आया हूँ। आप ही सबके आधार, सबके पालनकर्ता और दुःखों का नाश करने वाले हैं। मैं दीन, दुःखी और अल्पबुद्धि हूँ, आपकी महिमा का वर्णन करने में असमर्थ हूँ, फिर भी आपकी शरण में आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिए।”

उसकी करुण पुकार और भक्ति से भरे वचन सुनकर भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और गम्भीर स्वर में बोले, “हे वत्स! तुम्हारी तपस्या अत्यंत श्रेष्ठ है। मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम जो चाहो वर माँगो।”

तब सुदेव ने विनम्र भाव से कहा, “हे प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे एक सत्पुत्र प्रदान कीजिए। पुत्र के बिना यह गृहस्थ जीवन मुझे सूना प्रतीत होता है।”

यह सुनकर भगवान हरि कुछ क्षण मौन रहे, फिर बोले, “हे ब्राह्मण! तुम्हारे भाग्य में पुत्र का सुख नहीं लिखा है। मैंने तुम्हारे भविष्य को देखा है। सात जन्मों तक तुम्हें पुत्र प्राप्त नहीं होगा। इसलिए तुम कोई अन्य वर माँगो।”

भगवान के ये कठोर वचन सुनकर सुदेव का हृदय टूट गया। वह ऐसे भूमि पर गिर पड़ा जैसे जड़ कट जाने पर वृक्ष गिर जाता है। उसकी यह दशा देखकर उसकी पत्नी गौतमी अत्यंत व्याकुल हो उठी और विलाप करने लगी।

कुछ समय बाद धैर्य धारण कर गौतमी बोली, “हे स्वामी! उठिए। जो भाग्य में लिखा है वही प्राप्त होता है। मनुष्य अपने कर्मों का फल भोगता है। यदि भाग्य प्रतिकूल हो, तो सारे प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिए अब दैव को ही स्वीकार कीजिए।”

पत्नी के ये वचन सुनकर भी सुदेव का दुःख कम न हुआ। तभी भगवान के वाहन गरुड़जी यह दृश्य देखकर द्रवित हो उठे। वे भगवान विष्णु से बोले, “हे प्रभो! यह ब्राह्मण और इसकी पत्नी आपके परम भक्त हैं। इनके दुःख को देखकर आपकी करुणा कहाँ चली गई? आपने सदैव अपने भक्तों की रक्षा की है, फिर आज आप इन्हें पुत्र देने में संकोच क्यों कर रहे हैं?

हे नाथ! आपके लिए तो सब कुछ संभव है। जब आपने सुदामा को वैभव दिया और संदीपनी मुनि को उनका मृत पुत्र वापस दिलाया, तो इस ब्राह्मण को पुत्र देना आपके लिए क्या कठिन है?”

गरुड़जी के करुणामय वचन सुनकर भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और बोले, “हे वैनतेय! तुम ठीक कहते हो। यह ब्राह्मण मेरा भक्त है, इसलिए इसे एक पुत्र अवश्य मिलना चाहिए।”

भगवान की आज्ञा पाकर गरुड़जी अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने तुरंत सुदेव को एक सुन्दर और योग्य पुत्र प्रदान किया।

श्रीनारायण बोले, “हे नारद! इस प्रकार भगवान की कृपा और गरुड़जी के अनुरोध से सुदेव को पुत्र प्राप्त हुआ।”


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 16 (कथारूप सार)

श्रीनारायण बोले, “हे नारद! अब आगे की अद्भुत कथा सुनो, जो महर्षि वाल्मीकि ने राजा दृढ़धन्वा को सुनाई थी।”

गरुड़जी ने भगवान हरि की आज्ञा से सुदेव ब्राह्मण को समझाते हुए कहा, “हे द्विजश्रेष्ठ! यद्यपि तुम्हारे भाग्य में सात जन्मों तक पुत्र का सुख नहीं लिखा है, फिर भी भगवान की कृपा से मैं तुम्हें अपने अंश से एक पुत्र देता हूँ। परंतु ध्यान रहे, यह पुत्र तुम्हें सुख के साथ-साथ दुःख भी देगा।”

गरुड़जी ने आगे कहा, “मनुष्य का जीवन जल के बुलबुले के समान क्षणभंगुर है। इस नश्वर शरीर को पाकर जो व्यक्ति भगवान हरि का स्मरण करता है, वही वास्तव में धन्य है। संसार-सागर से पार लगाने वाले केवल भगवान ही हैं, अतः उनके स्मरण में स्थित रहो।”

इसके पश्चात् भगवान हरि गरुड़ पर आरूढ़ होकर वैकुण्ठ को चले गए और सुदेव अपनी पत्नी गौतमी के साथ प्रसन्न होकर अपने घर लौट आया। कुछ समय बाद गौतमी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया।

उस बालक का नाम शुकदेव रखा गया, क्योंकि वह शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान तेजस्वी और मन को आनन्द देने वाला था। समय के साथ वह बालक बढ़ने लगा और उपनयन संस्कार के बाद वेद-अध्ययन में प्रवृत्त हुआ। उसकी बुद्धि तीव्र थी और उसने शीघ्र ही समस्त विद्या प्राप्त कर ली।

एक दिन महान तेजस्वी देवल ऋषि वहाँ पधारे। सुदेव ने उनका आदर-सत्कार किया। बालक को देखकर देवल ऋषि अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, “हे सुदेव! तुम अत्यंत भाग्यशाली हो। तुम्हारा पुत्र गुणों का भंडार है। बुद्धिमान, विनीत और वेदों का ज्ञाता।”

किन्तु कुछ क्षण बाद देवल ऋषि गंभीर हो गए और बोले, “इस बालक में एक दोष है। इसकी आयु अल्प है। यह बारहवें वर्ष में जल में डूबकर मृत्यु को प्राप्त होगा।”

यह सुनते ही सुदेव और गौतमी शोक से व्याकुल होकर भूमि पर गिर पड़े। सुदेव विलाप करने लगे।

तब धैर्य धारण कर गौतमी ने अपने पति को समझाया, “हे स्वामी! जो होना निश्चित है, उससे भय करना व्यर्थ है। संसार में राजा नल, राम, युधिष्ठिर जैसे महान पुरुषों ने भी दुःख भोगे हैं। इसलिए शोक को त्यागकर भगवान हरि का स्मरण कीजिए, वही हमारे रक्षक हैं।”

पत्नी के इन धैर्यपूर्ण वचनों को सुनकर सुदेव ने अपने मन को स्थिर किया और भगवान के चरणों में ध्यान लगाकर पुत्र-वियोग के भय को त्याग दिया।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 18 (कथारूप सार)

नारदजी बोले, “हे प्रभो! आगे उस राजा दृढ़धन्वा का क्या हुआ, कृपा कर वह कथा सुनाइए, जिसका श्रवण पापों का नाश करता है।”

श्रीनारायण बोले, “हे नारद! अपने पूर्वजन्म का अद्भुत चरित्र सुनकर राजा दृढ़धन्वा और अधिक जानने को उत्सुक हुए। तब महर्षि वाल्मीकि ने आगे की कथा कहना आरम्भ किया।”

बाल्मीकि मुनि बोले, “हे राजन्! जब गौतमी के शीतल और धैर्यपूर्ण वचन सुदेव शर्मा ने सुने, तब उन्होंने अपने मन को स्थिर किया और भगवान हरि के स्मरण में लीन होकर अपने कर्तव्यों में लग गए। एक दिन वे समिधा, कुश और पुष्प लेने के लिए वन को गए और वहाँ भी भगवान के चरणों का ध्यान करते रहे।”

उसी समय उनका पुत्र शुकदेव अपने मित्रों के साथ खेलने के लिए एक बावड़ी के पास गया। सभी बालक जल में क्रीड़ा करने लगे। खेलते-खेलते शुकदेव ने अपने साथियों को छकाने के लिए गहरे जल में गोता लगाया, परन्तु दुर्भाग्यवश वह बाहर न आ सका और उसी जल में उसकी मृत्यु हो गई।

जब बालकों ने उसे बाहर आते नहीं देखा, तो वे घबरा गए और दौड़कर उसकी माता गौतमी को यह दुःखद समाचार दिया। यह सुनते ही गौतमी भूमि पर गिर पड़ी। उसी समय सुदेव भी वन से लौटे और पुत्र के निधन का समाचार सुनकर वे भी वज्राघात के समान भूमि पर गिर पड़े।

कुछ समय बाद दोनों पति-पत्नी बावड़ी के पास पहुँचे। वहाँ अपने मृत पुत्र को देखकर वे विलाप करने लगे। सुदेव ने पुत्र को गोद में उठाया, उसके मुख को बार-बार चूमा और रोते हुए करुण वचन कहने लगे, “हे पुत्र! उठो, मुझसे मधुर वचन कहो। हमें छोड़कर कहाँ चले गए? तुम्हारे बिना यह घर शून्य हो गया है। मैं तुम्हारे बिना कहीं नहीं जाऊँगा। तुम्हारी माता रो-रोकर व्याकुल हो रही है, क्या तुम्हें उस पर दया नहीं आती?”

मैंने कौन-सा पाप किया था, जिसके कारण मुझे यह दुःख सहना पड़ा? हे ईश्वर! यह कैसा अन्याय है? संसार में ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ मृत पुत्र पुनः मिल सके।

हे पुत्र! एक बार बोलो, हमें सांत्वना दो। तुम्हारे बिना हमारा जीवन निरर्थक हो गया है।

इस प्रकार सुदेव विलाप करते हुए भगवान को भी पुकारने लगे, “हे गोविन्द! हे विष्णु! हे दीनबंधु! इस पुत्र-वियोग रूपी अग्नि से मुझे बचाइए। मैं अपने ही कर्मों का फल भोग रहा हूँ। मैंने आपके वचनों का उल्लंघन कर पुत्र की इच्छा की, यही मेरे दुःख का कारण है।”


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 18 (कथारूप सार)

नारदजी बोले, “हे प्रभो! आगे उस राजा दृढ़धन्वा का क्या हुआ? कृपा कर वह पवित्र कथा सुनाइए।”

श्रीनारायण बोले, “हे नारद! अपने पूर्व जन्म का अद्भुत वृत्तांत सुनकर राजा दृढ़धन्वा अत्यंत आश्चर्यचकित हुए और उन्होंने महर्षि वाल्मीकि से आगे की कथा सुनाने का आग्रह किया।”

दृढ़धन्वा बोले, “हे ब्रह्मन्! आपके अमृतमय वचनों को सुनकर भी मेरी तृप्ति नहीं हुई है। कृपा कर आगे की कथा कहिए।”

तब वाल्मीकि मुनि बोले, “हे राजन्! जब सुदेव ब्राह्मण अपने पुत्र शुकदेव के वियोग में विलाप कर रहा था, तभी आकाश में भयंकर गर्जना होने लगी। असमय में मेघ घिर आए, तीव्र वायु चलने लगी और बिजली चमकने लगी। एक मास तक निरंतर वर्षा होती रही, जिससे पृथ्वी जल से भर गई।

परंतु पुत्र-शोक में डूबे सुदेव को कुछ भी ज्ञात नहीं हुआ। न उसने भोजन किया, न जल पिया। वह केवल हे पुत्र! हे पुत्र! कहकर विलाप करता रहा। संयोग से वह पूरा समय पुरुषोत्तम मास था, और अनजाने में ही उसने इस पवित्र मास का व्रत कर लिया।”

उसके इस अनजाने व्रत से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए। उनके दर्शन होते ही मेघ हट गए और वातावरण शांत हो गया। सुदेव ने अपने पुत्र के शरीर को भूमि पर रखकर पत्नी सहित भगवान को दण्डवत प्रणाम किया।

भगवान श्रीहरि मधुर वाणी में बोले, “हे सुदेव! तुम अत्यंत भाग्यशाली हो। तुम्हारा पुत्र अब बारह हजार वर्षों की आयु वाला होगा। तुम्हें उससे पूर्ण सुख प्राप्त होगा। यह सब पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से संभव हुआ है।”

भगवान ने आगे एक प्राचीन कथा सुनाई, “एक समय धनु नामक मुनि ने अमर पुत्र की इच्छा से कठोर तप किया। देवताओं ने वर माँगने को कहा, तो उन्होंने अमर पुत्र माँगा। देवताओं ने असमर्थता जताई, तब उन्होंने पर्वत के समान दीर्घायु पुत्र माँगा। उन्हें वैसा पुत्र मिला, पर वह अहंकारी होकर मुनियों का अपमान करने लगा। अंततः एक ऋषि के शाप से उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार हठपूर्वक माँगी गई वस्तु अंततः दुःख का कारण बनती है।”

भगवान ने सुदेव से कहा, “हे ब्राह्मण! गरुड़ द्वारा दिया गया तुम्हारा पुत्र अब पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से चिरायु हो गया है। तुम इस पुत्र के साथ सुखपूर्वक जीवन बिताओगे, फिर ब्रह्मलोक को प्राप्त होकर पुनः पृथ्वी पर जन्म लेकर दृढ़धन्वा नामक राजा बनोगे।”

तुम्हारी पत्नी गौतमी ही उस जन्म में गुणसुंदरी बनेगी, और तुम्हें चार पुत्र तथा एक कन्या प्राप्त होगी। अंततः जब तुम संसार में मोहग्रस्त हो जाओगे, तब यही पुत्र शुक पक्षी बनकर तुम्हें वैराग्य का उपदेश देगा और तुम ज्ञान प्राप्त कर भगवान के परम धाम को प्राप्त हो जाओगे।

भगवान के यह वचन सुनते ही मृत बालक जीवित हो उठा। माता-पिता अत्यंत हर्षित हो गए और देवताओं ने पुष्प वर्षा की।

तब सुदेव ने विनम्र होकर भगवान से पूछा, “हे प्रभो! आपने पहले कहा था कि मुझे पुत्र प्राप्त नहीं होगा, फिर आज आपने मेरे मृत पुत्र को जीवित कैसे किया?”

इस प्रकार सुदेव के मन में उत्पन्न संदेह को दूर करने के लिए भगवान आगे उपदेश देने लगे।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 19 (कथारूप सार)

ऋषियों की सभा में गम्भीर शान्ति छाई हुई थी। सभी मुनि अग्नि के चारों ओर बैठे, सूतजी की ओर एकाग्र दृष्टि से देख रहे थे। उनके हृदय में एक ही जिज्ञासा थी। उस अद्भुत घटना का रहस्य जानना, जिसमें एक मृत बालक पुनः जीवित हो उठा था।

नारद जी ने विनम्रता से कहा, “हे प्रभो! उस तपस्वी ब्राह्मण सुदेव को भगवान विष्णु ने क्या उत्तर दिया? कृपा करके विस्तार से बताइये।”

सूतजी ने मंद मुस्कान के साथ कथा आरम्भ की, “हे मुनियों! जब सुदेव ब्राह्मण ने अपने हृदय की शंका भगवान के सामने रखी, तब भक्तवत्सल भगवान विष्णु अत्यन्त प्रसन्न हुए। उनकी वाणी मेघ के समान गम्भीर और अमृत के समान मधुर थी।

भगवान बोले, “हे द्विजराज! तुम नहीं जानते कि तुमने कितना महान कार्य किया है। यह पुरुषोत्तम मास, जो हमें अत्यन्त प्रिय है, उसी का प्रभाव है। तुम शोक में डूबे हुए थे, परन्तु अनजाने में ही तुमसे इस मास का व्रत और तप हो गया।”

एक महीने तक तुमने अन्न नहीं लिया। यह उपवास बन गया। वर्षा के कारण तुमने दिन में तीन बार स्नान किया, यह पवित्र स्नान बन गया। और शोक में डूबे रहकर तुमने संसार से विरक्ति धारण की, यह महान तप बन गया।

हे ब्राह्मण! इस पुरुषोत्तम मास का प्रभाव इतना महान है कि यदि कोई एक दिन भी इसका व्रत करे, तो उसके अनन्त पाप नष्ट हो जाते हैं। देवताओं ने भी इसके माहात्म्य को तौलने का प्रयास किया, परन्तु सभी साधन इसके सामने हल्के सिद्ध हुए।

भगवान के ये वचन सुनकर सुदेव के हृदय में आश्चर्य और श्रद्धा का समुद्र उमड़ पड़ा। उसे समझ आ गया कि जो कुछ हुआ, वह केवल भगवान की कृपा और पुरुषोत्तम मास की महिमा से ही सम्भव था।

इसके बाद भगवान विष्णु गरुड़ पर आरूढ़ होकर वैकुण्ठ को प्रस्थान कर गये।

सुदेव ब्राह्मण और उसकी पत्नी गौतमी अपने पुत्र शुकदेव को पुनः जीवित देखकर अत्यन्त आनन्दित हुए। उनका घर, जो शोक से भर गया था, अब हर्ष और कृतज्ञता से भर उठा।

सुदेव ने मन ही मन सोचा, “मैं तो अज्ञानवश इस मास का पालन कर बैठा, और इसका इतना महान फल मिला! यह मास सचमुच अद्भुत है।”

तब से वह हर वर्ष श्रद्धा और भक्ति से पुरुषोत्तम मास का पालन करने लगा। जप, तप, हवन और भगवान की पूजा में उसका मन रम गया। उसने कर्मफल की इच्छा त्यागकर केवल भक्ति मार्ग को अपना लिया।

समय बीतता गया। सुदेव और गौतमी ने अपने पुत्र के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया। अंततः, हजारों वर्षों तक धर्मपूर्वक जीवन जीने के बाद, वे दोनों विष्णु लोक को प्राप्त हुए। जहाँ शोक और दुःख का नाम भी नहीं था।

वहाँ दिव्य सुखों का अनुभव करने के पश्चात्, वे पुनः पृथ्वी पर जन्म लेकर राजा दृढ़धन्वा और उनकी रानी गुणसुन्दरी के रूप में प्रकट हुए।

शुकदेव, जो उनका पुत्र था, वह भी पूर्वजन्म के संस्कारों से युक्त होकर शुक पक्षी के रूप में आया और अपने पिता को वैराग्य का उपदेश देकर उनका कल्याण किया।

इस प्रकार, सूतजी ने कथा समाप्त करते हुए कहा, “हे राजन्! यह सब तुम्हारे ही पूर्व जन्म की कथा है। पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से ही तुम्हें यह वैभव, यह राज्य और यह ज्ञान प्राप्त हुआ है।”

सभा में बैठे सभी ऋषि इस अद्भुत कथा को सुनकर भाव-विभोर हो उठे। उनके हृदय में पुरुषोत्तम मास के प्रति अटूट श्रद्धा जाग उठी।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 20 (कथारूप सार)

ऋषियों की पवित्र सभा में एक बार फिर गम्भीर वातावरण छा गया। सभी मुनि भगवान नारायण की दिव्य कथाओं में तल्लीन थे, परन्तु उनके मन की जिज्ञासा अभी शान्त नहीं हुई थी।

तभी सूतजी बोले, “हे विप्रों! जब नारद मुनि ने भगवान नारायण के मुख से राजा दृढ़धन्वा के पूर्वजन्म का अद्भुत वृत्तांत सुना, तब भी उनके हृदय को पूर्ण तृप्ति नहीं मिली। वे और अधिक जानने की इच्छा से पुनः प्रश्न करने लगे।”

नारदजी विनम्र होकर बोले, “हे प्रभो! उस समय राजा दृढ़धन्वा ने महर्षि वाल्मीकि से क्या कहा? कृपा करके विस्तार से बताइये।”

भगवान नारायण मुस्कुराए और बोले, “हे नारद! अब तुम ध्यानपूर्वक सुनो। जब राजा दृढ़धन्वा ने अपने पूर्वजन्म का रहस्य जाना, तब उनके हृदय में वैराग्य और जिज्ञासा का उदय हुआ। वे महर्षि वाल्मीकि के चरणों में प्रणाम कर विनीत भाव से बोले, “हे मुनिश्रेष्ठ! मुझे बताइये कि मोक्ष की इच्छा रखने वाले मनुष्य को पुरुषोत्तम मास का व्रत किस प्रकार करना चाहिए? कौन-सा दान देना चाहिए और उसकी विधि क्या है?”

हे प्रभो! यह ज्ञान केवल मेरे लिए ही नहीं, बल्कि समस्त लोकों के कल्याण के लिए आवश्यक है। आपने ही बताया कि यह पुरुषोत्तम मास स्वयं भगवान का स्वरूप है। मैं पूर्वजन्म में सुदेव ब्राह्मण था, और अनजाने में इस मास का पालन किया, जिसके प्रभाव से मेरा मृत पुत्र भी जीवित हो गया।

किन्तु हे मुनिवर! अब इस जन्म में मैं सब कुछ भूल गया हूँ। अतः कृपा करके इसकी सम्पूर्ण विधि पुनः बताइये।

राजा के इन विनीत वचनों को सुनकर महर्षि वाल्मीकि अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने शांत स्वर में विस्तार से पुरुषोत्तम मास की विधि बतानी आरम्भ की, “हे राजन्! इस पवित्र मास में मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में उठकर सबसे पहले भगवान का स्मरण करना चाहिए। शुद्धता का विशेष ध्यान रखते हुए नित्यकर्म सम्पन्न करे। शौच, स्नान, आचमन और दन्तधावन आदि विधिपूर्वक करें।

स्नान के पश्चात् शुद्ध वस्त्र धारण कर, गोपीचन्दन से तिलक लगाकर, प्राणायाम और संध्या-वंदन करे। फिर एक पवित्र स्थान पर मण्डल बनाकर कलश स्थापित करे और उसमें तीर्थों का आवाहन करे। गंगा, गोदावरी, कावेरी और सरस्वती का स्मरण करे।

इसके बाद श्रद्धा और भक्ति से भगवान पुरुषोत्तम की मूर्ति स्थापित कर, विधिपूर्वक पूजा करे। गन्ध, अक्षत, पुष्प, दीप और नैवेद्य अर्पित करे।

हे राजन्! यह शरीर बहुत दुर्लभ है। धन, घर, पुत्र ये सब बार-बार मिल सकते हैं, परन्तु यह मानव शरीर बार-बार नहीं मिलता। इसलिए इसे धर्म के लिए ही उपयोग करना चाहिए।

यह संसार क्षणभंगुर है। युवावस्था पुष्प के समान शीघ्र मुरझा जाती है, धन जल की तरंग के समान चंचल है और जीवन प्रतिदिन घटता जाता है। इसलिए बुद्धिमान वही है जो समय रहते धर्म का पालन करता है।

जब मन, धन और योग्य पात्र ये तीनों एक साथ मिल जाएँ, तब बिना विलम्ब किये दान और धर्म करना चाहिए।

हे नृपश्रेष्ठ! इस पुरुषोत्तम मास का महत्त्व इतना महान है कि थोड़े से साधन से भी मनुष्य महान पुण्य प्राप्त कर सकता है। केवल स्नान, दान और भगवान विष्णु का स्मरण भी मनुष्य को बड़े-बड़े संकटों से बचा लेता है।

जैसे गंगा सभी नदियों में श्रेष्ठ है, वैसे ही सभी महीनों में पुरुषोत्तम मास सर्वोत्तम है। यह स्वयं भगवान का स्वरूप है। अतः श्रद्धा और भक्ति से इसकी पूजा करनी चाहिए।

भगवान नारायण आगे बोले, “हे नारद! इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि ने राजा दृढ़धन्वा को पुरुषोत्तम मास की सम्पूर्ण विधि और उसका गूढ़ रहस्य समझाया। जो मनुष्य इस संसार रूपी भयंकर सागर से पार होना चाहता है, उसे इस पवित्र मास में भगवान पुरुषोत्तम की भक्ति अवश्य करनी चाहिए।”

सूतजी ने कथा समाप्त करते हुए कहा, “हे मुनियों! इस प्रकार यह पवित्र अध्याय समाप्त होता है। जो श्रद्धा से इसे सुनता या पढ़ता है, वह पापों से मुक्त होकर भगवान के परम धाम को प्राप्त करता है।”



Source: narayanseva.org

Read in Hindi - Purushottam Maas Mahatmya Katha in 3 parts :







Purushottam Maas Mahatmya Katha from Chapter 1 to 10 : पुरुषोत्तम मास महात्म्य कथा: अध्याय 1 से अध्याय 10 तक


सनातन धर्म की दिव्य परंपराओं में पुरुषोत्तम मास का विशेष और अद्वितीय महत्व है। यह मास केवल एक अतिरिक्त कालखंड नहीं, बल्कि भगवान श्रीहरि विष्णु की अनंत कृपा का प्रतीक माना गया है। जब-जब समय के गणना चक्र में असंतुलन उत्पन्न होता है, तब यह पवित्र मास प्रकट होकर धर्म और साधना के मार्ग को सुदृढ़ करता है। आज हम पुरुषोत्तम मास के अध्याय 1 से अध्याय 10 तक की कथा का माहात्म्य जानेंगे।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 1 (कथारूप सार)

एक समय की बात है; भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले, वृन्दावन के स्वामी भगवान् पुरुषोत्तम को प्रणाम करते हुए इस पवित्र कथा का आरम्भ होता है। भगवान नारायण, नर-नरोत्तम, देवी सरस्वती और महर्षि व्यास का स्मरण कर यह कथा आगे बढ़ती है।

पवित्र नैमिषारण्य में अनेक महान ऋषि-मुनि एकत्र हुए थे। वे सभी वेदों के ज्ञाता, तपस्वी, ब्रह्मनिष्ठ और परोपकारी थे। उनका उद्देश्य था, यज्ञ के माध्यम से संसार का कल्याण करना और ऐसा ज्ञान प्राप्त करना, जिससे जीवों का उद्धार हो सके।

उसी समय सूतजी, जो कि महान कथावाचक और शास्त्रों के मर्मज्ञ थे, तीर्थयात्रा करते हुए वहाँ पहुँचे। उनका स्वरूप अत्यंत दिव्य था। वे शांत, संयमी, भगवान के नाम में लीन और आध्यात्मिक तेज से प्रकाशित थे।

सूतजी को देखकर सभी ऋषि आदरपूर्वक खड़े हो गए। उन्होंने उन्हें उत्तम आसन दिया और विनम्रता से निवेदन किया, “हे सूतजी! आप सब शास्त्रों के ज्ञाता हैं। कृपा करके हमें ऐसी कथा सुनाइए, जो सारभूत हो, कल्याणकारी हो और हमें इस संसार रूपी सागर से पार लगाने वाली हो।”

ऋषियों की यह विनती सुनकर सूतजी प्रसन्न हुए और उन्होंने कथा प्रारम्भ की।

सूतजी ने बताया कि वे अनेक पवित्र तीर्थों की यात्रा करते हुए वहाँ पहुँचे हैं। उन्होंने पुष्कर, यमुना, गंगा, काशी, गया, त्रिवेणी, गोदावरी, कावेरी, नर्मदा आदि पवित्र नदियों और स्थानों पर स्नान किया, तर्पण किया और देवताओं-पितरों की पूजा की।

यात्रा करते-करते वे हस्तिनापुर पहुँचे, जहाँ उन्होंने सुना कि राजा परीक्षित ने अपना राज्य त्याग दिया है और गंगा तट पर तपस्या कर रहे हैं। यह सुनकर सूतजी भी वहाँ पहुँचे।

गंगा के किनारे का दृश्य अत्यंत अद्भुत था। अनेक सिद्ध, योगी और ऋषि वहाँ एकत्र थे, जो विभिन्न प्रकार की कठोर तपस्याएँ कर रहे थे। कोई उपवास कर रहा था, कोई केवल वायु पर निर्भर था, तो कोई फलाहार कर जीवन यापन कर रहा था।

उसी समय वहाँ एक महान दिव्य घटना घटी। महर्षि व्यास के पुत्र, ब्रह्मज्ञानी और महान योगी श्री शुकदेव जी वहाँ पधारे। वे युवा थे, परन्तु उनके भीतर अद्भुत वैराग्य और ज्ञान था।

उनका स्वरूप अलौकिक था। वे संसार के मोह से पूर्णतः मुक्त और ब्रह्म में लीन थे। उनके आगमन पर सभी ऋषि-मुनि सम्मान में खड़े हो गए और उन्हें एक ऊँचे आसन पर विराजमान किया।

शुकदेव जी उस सभा में ऐसे शोभित हो रहे थे, जैसे आकाश में चन्द्रमा तारों से घिरा हुआ चमकता है। सभी मुनि उनके चारों ओर बैठकर उनके मुख से ज्ञान और भगवान् की कथा सुनने के लिए उत्सुक हो गए।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 2 (कथारूप सार)

सूतजी बोले, “हे मुनियों! जब राजा परीक्षित गंगातट पर पहुँचे, तब भगवान शुकदेव जी ने उन्हें श्रीमद्भागवत की अमृतमयी कथा सुनाई। उस कथा को सुनकर राजा परीक्षित को मोक्ष प्राप्त हुआ। उस दिव्य दृश्य को देखकर और वहाँ के पुण्य वातावरण का अनुभव कर मैं यहाँ आप सबके यज्ञ का दर्शन करने आया हूँ। आप जैसे ब्राह्मणों को देखकर मैं स्वयं को धन्य मानता हूँ।”

ऋषियों ने कहा, “हे सूतजी! आपने जो भगवान व्यास के मुख से सुना है, वह अत्यंत अद्भुत और दुर्लभ है। कृपा करके हमें वही कथा सुनाइए, जो जीवन का सार हो, जो मन को शांति दे और जो अमृत से भी बढ़कर हितकारी हो।”

सूतजी विनम्रता से बोले, “मैं तो साधारण हूँ, परन्तु आप महान ऋषि मुझसे प्रश्न कर रहे हैं, यह मेरा सौभाग्य है। जो कुछ मैंने अपने गुरु व्यासजी से सुना है, वही मैं आपको सुनाता हूँ।”

इसके बाद सूतजी ने एक पुरातन प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया, एक बार देवर्षि नारद, बद्रीनाथ के समीप स्थित नर-नारायण के आश्रम में पहुँचे। वह आश्रम अत्यंत पवित्र और दिव्य था। वहाँ अनेक तपस्वी, सिद्ध और देवता निवास करते थे। चारों ओर हरियाली, फल-फूल से लदे वृक्ष, और पवित्र गंगा व अलकनंदा की धारा उस स्थान को और भी सुंदर बना रही थी।

नारद मुनि ने वहाँ पहुँचकर भगवान नारायण को साष्टांग प्रणाम किया। भगवान नारायण गहन तप में लीन थे, उनके तेज से समस्त वातावरण प्रकाशित हो रहा था। उन्हें देखकर नारदजी ने अत्यंत श्रद्धा और प्रेम से उनकी स्तुति की।

नारद जी बोले, “हे देवों के देव! हे जगन्नाथ! आप कृपा के सागर हैं। आपका तप सम्पूर्ण प्राणियों के कल्याण के लिए है। कलियुग में जीव अज्ञान और विषयों में फँसे हुए हैं। ऐसे समय में उनके उद्धार के लिए कोई सरल और प्रभावी उपाय बताइए, जिससे उनका कल्याण हो और उन्हें मोक्ष प्राप्त हो सके। मैं भी आपके मुख से वही ज्ञान सुनना चाहता हूँ।”

नारद जी के मधुर और करुणामय वचनों को सुनकर भगवान नारायण प्रसन्न हुए और बोले, “हे नारद! तुम भगवान की महिमा को जानते हो, फिर भी लोककल्याण के लिए पूछ रहे हो, यह बहुत उत्तम है। मैं तुम्हें एक अत्यंत पुण्यदायक रहस्य बताता हूँ।- यह है पुरुषोत्तम मास का माहात्म्य।”

भगवान नारायण ने कहा, “यह पुरुषोत्तम मास अत्यंत पवित्र है। इसके स्वामी स्वयं भगवान पुरुषोत्तम हैं। इस मास में जो भी भक्त श्रद्धा से व्रत, जप, दान और पूजा करता है, उस पर भगवान अत्यंत प्रसन्न होते हैं और उसे सभी कष्टों से मुक्त कर देते हैं।”

नारद जी ने पुनः प्रश्न किया, “हे प्रभु! अन्य महीनों के देवता तो मैंने सुने हैं, परन्तु पुरुषोत्तम मास का रहस्य क्या है? इसमें क्या करना चाहिए, कौन-से नियम अपनाने चाहिए, और इससे क्या फल प्राप्त होता है। कृपा करके विस्तार से बताइए।

नारद जी ने आगे कहा, “हे प्रभु! इस संसार में अनेक लोग दुखी हैं। कोई दरिद्र है, कोई रोगी, कोई संतानहीन, कोई दुख और शोक से पीड़ित। ऐसे सभी लोगों के कष्ट दूर करने वाला उपाय हमें बताइए।”

सूतजी कहते हैं: नारद जी के इन करुणा से भरे वचनों को सुनकर भगवान नारायण गंभीर और शांत स्वर में आगे की कथा कहने लगे, जिससे समस्त संसार का कल्याण हो सके।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 3 (कथारूप सार)

नैमिषारण्य में बैठे ऋषियों ने सूतजी से विनम्रतापूर्वक कहा, “हे महाभाग! भगवान नारायण ने नारद जी से जो शुभ और रहस्यमयी वचन कहे, उन्हें हमें विस्तार से सुनाइए।”

सूतजी बोले, “हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों! मैं वही कथा सुनाता हूँ, जैसी मैंने सुनी है। ध्यानपूर्वक सुनिए।”

भगवान नारायण बोले, “हे नारद! पहले एक पुरातन प्रसंग सुनो, जो स्वयं श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा था। एक समय की बात है। द्यूत क्रीड़ा में छलपूर्वक हारकर युधिष्ठिर और उनके भाई पांडव अपना राज्य खो बैठे। सबके सामने द्रौपदी का अपमान हुआ; दुष्ट दुःशासन ने उसके केश पकड़कर उसे सभा में घसीटा और उसके वस्त्र उतारने का प्रयास किया। उस संकट की घड़ी में भगवान श्रीकृष्ण ने उसकी लाज की रक्षा की।

इसके बाद पांडव वनवास को चले गए और काम्यवन में रहने लगे। वहाँ वे अत्यंत कष्ट में जीवन बिताते थे। कंद-मूल और फल खाकर, धूल से ढके शरीर और बढ़े हुए बालों के साथ वे तपस्वियों की तरह जीवन जी रहे थे। एक दिन भगवान श्रीकृष्ण, मुनियों के साथ उन्हें देखने वहाँ पहुँचे।

भगवान को देखकर पांडव ऐसे प्रसन्न हुए मानो मृत शरीर में प्राण लौट आए हों। उन्होंने प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया और चरणों में प्रणाम किया। द्रौपदी भी अत्यंत विनम्रता से उनके सामने उपस्थित हुई। पांडवों और द्रौपदी की दयनीय अवस्था देखकर भगवान श्रीकृष्ण का हृदय द्रवित हो गया और वे कौरवों पर अत्यंत क्रोधित हो उठे।

उनका क्रोध प्रलय की अग्नि के समान भयंकर था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे सम्पूर्ण संसार को नष्ट कर देंगे। यह देखकर अर्जुन भयभीत हो गए और उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान की स्तुति करते हुए कहा, “हे प्रभु! आप जगत के रक्षक हैं। एक के अपराध के कारण सम्पूर्ण सृष्टि का नाश करना उचित नहीं है। जैसे कोई मच्छरों को मारने के लिए अपना घर नहीं जलाता, वैसे ही आप भी क्रोध को शांत करें।”

अर्जुन के विनम्र वचनों को सुनकर भगवान श्रीकृष्ण शांत हो गए। उनका क्रोध शांत होते ही पांडवों ने राहत की सांस ली और प्रेमपूर्वक उनकी सेवा की। इसके बाद अर्जुन ने भगवान से वही प्रश्न किया, जो आगे नारद जी ने नारायण से पूछा था, “हे प्रभु! ऐसा कौन-सा उपाय है जिससे मनुष्य के सभी दुख दूर हो जाएँ?”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “हे अर्जुन! यह अत्यंत गुप्त और दुर्लभ रहस्य है, जिसे ऋषि-मुनि भी आसानी से नहीं जानते। फिर भी तुम्हारे प्रेम और भक्ति के कारण मैं तुम्हें बताता हूँ।”

उन्होंने आगे समझाया कि इस सृष्टि में हर वस्तु जैसे समय, मास, ऋतु, नदियाँ, पर्वत, वन, औषधियाँ सबके अपने-अपने अधिष्ठाता देवता होते हैं, जिनकी पूजा से फल प्राप्त होता है।

फिर उन्होंने एक अद्भुत कथा सुनाई, एक बार एक ‘अधिक मास‘ उत्पन्न हुआ। लेकिन उसमें सूर्य की संक्रांति नहीं होने के कारण सभी लोगों ने उसे तुच्छ और अशुभ मान लिया। उसे ‘मलमास‘ कहकर अपमानित किया गया। इस तिरस्कार से वह मास अत्यंत दुखी और निराश हो गया।

अंततः वह भगवान विष्णु की शरण में वैकुण्ठ पहुँचा। वहाँ भगवान को दिव्य सिंहासन पर विराजमान देखकर उसने अश्रुपूर्ण नेत्रों से साष्टांग प्रणाम किया और अपने दुख को व्यक्त करने के लिए विनती की।

इतना कहकर बद्रीनाथ थोड़ी देर के लिए मौन हो गए। तब नारद जी ने उत्सुक होकर पूछा, “हे प्रभु! उस अधिक मास ने भगवान के सामने क्या कहा?”।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 4 (कथारूप सार)

भगवान नारायण, नारद मुनि से बोले, “हे नारद! अब मैं तुम्हें वह करुण कथा सुनाता हूँ, जो अधिक मास ने स्वयं भगवान पुरुषोत्तम के सामने कही थी। यह कथा लोककल्याण करने वाली है, ध्यानपूर्वक सुनो।”

अधिक मास अत्यंत दुखी होकर भगवान के चरणों में गिर पड़ा और करुण स्वर में बोला, “हे प्रभु! हे कृपा के सागर! मुझसे बलवान अन्य महीनों ने मुझे ‘मलमास‘ कहकर तुच्छ ठहरा दिया है। उन्होंने मुझे अपने बीच से निकाल दिया है। मैं अनाथ और स्वामीहीन हो गया हूँ। आप तो दीनों के रक्षक हैं, फिर मेरी रक्षा क्यों नहीं करते?”

वह आगे बोला, “हे नाथ! जैसे आपने संकट में पड़े भक्तों की रक्षा की, वैसे ही मेरी भी रक्षा कीजिए। आपने देवकी की रक्षा की, द्रौपदी की लाज बचाई, कालिय नाग के विष से ग्वालों और गायों को बचाया, जंगल की अग्नि से व्रजवासियों को सुरक्षित किया, जरासंध के बंधन से राजाओं को छुड़ाया और गजराज को ग्राह के मुख से बचाया। तो क्या मैं आपकी शरण में आकर भी अनाथ रह जाऊँ?”

इतना कहकर अधिक मास रोने लगा। उसके नेत्रों से आँसू बहने लगे और वह भगवान के सामने खड़ा-खड़ा अपनी व्यथा में डूब गया।

भगवान विष्णु यह दृश्य देखकर अत्यंत दयालु हो उठे। उन्होंने स्नेहपूर्वक कहा, “हे वत्स! तुम इतने दुखी क्यों हो? तुम्हारे मन में कौन-सा कष्ट है? मेरी शरण में आने वाला कभी शोक में नहीं रहता। यह वैकुण्ठ ऐसा स्थान है जहाँ न दुख है, न बुढ़ापा, न मृत्यु का भय। यहाँ केवल आनंद ही आनंद है। फिर तुम यहाँ आकर भी दुखी क्यों हो?”

भगवान के ये वचन सुनकर अधिक मास ने कुछ धैर्य धारण किया और गहरी साँस लेते हुए बोला, “हे प्रभु! आप सर्वज्ञ हैं, आपसे कुछ भी छिपा नहीं है। फिर भी मैं अपनी व्यथा कहता हूँ। संसार के सभी काल क्षण, मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष और अन्य मास सबके अपने-अपने स्वामी हैं, इसलिए वे सम्मानित हैं। परन्तु मेरा कोई नाम नहीं, कोई स्वामी नहीं, कोई स्थान नहीं। इसी कारण सभी मुझे तुच्छ समझते हैं और शुभ कार्यों में मुझे वर्जित कर देते हैं।”

वह और भी दुखी होकर बोला, “लोग मुझे ‘मलमास‘ कहकर अपमानित करते हैं। कहते हैं कि मैं अशुभ हूँ, त्याज्य हूँ, और सभी कार्यों में बाधा डालने वाला हूँ। इस अपमान से मेरा हृदय टूट गया है। अब मुझे जीने की इच्छा नहीं है। ऐसे निंदित जीवन से तो मृत्यु ही श्रेष्ठ है।”

अधिक मास की यह करुण पुकार सुनकर वह बार-बार कहने लगा, “मैं नहीं जीना चाहता, मैं मर जाऊँगा।” ऐसा कहते-कहते वह अचानक भगवान के चरणों में गिर पड़ा। यह देखकर वहाँ उपस्थित सभी देवता और पार्षद आश्चर्यचकित रह गए।

भगवान श्रीहरि का हृदय करुणा से भर गया। वे मेघ के समान गंभीर और चन्द्रमा की किरणों के समान शीतल वाणी में उसे शांत करते हुए बोले, “हे प्रिय! धैर्य रखो, मैं तुम्हारे दुःख का निवारण अवश्य करूँगा।”

सूतजी कहते हैं: हे ब्राह्मणों! भगवान के ये वचन पापरूपी समुद्र को सुखाने वाली अग्नि के समान थे। उन्हें सुनकर नारद मुनि अत्यंत प्रसन्न हुए और आगे की कथा सुनने के लिए उत्सुक हो उठे।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 5 (कथारूप सार)

देवर्षि नारद ने भगवान नारायण से जिज्ञासा की, “हे प्रभु! जब अधिक मास ने अपनी करुण व्यथा भगवान के सामने कही, तब भगवान श्रीहरि ने उससे क्या कहा? कृपा करके विस्तार से बताइए।”

भगवान नारायण बोले, “हे नारद! ध्यानपूर्वक सुनो। जब अधिक मास अत्यंत दुखी होकर भगवान के चरणों में गिर पड़ा और मूर्छित हो गया, तब भगवान के संकेत से गरुड़ उसे अपने पंखों से हवा करने लगे। कुछ ही क्षणों में अधिक मास को चेतना आई। वह पुनः विलाप करते हुए बोला, “हे प्रभु! मेरी रक्षा कीजिए, मैं आपकी शरण में आया हूँ। आप मेरी उपेक्षा क्यों कर रहे हैं?”

उसकी करुण पुकार सुनकर भगवान विष्णु दयालु हो उठे। उन्होंने स्नेह से कहा, “हे वत्स! उठो, धैर्य रखो। शोक मत करो। तुम्हारा दुःख अब दूर होगा।” यह कहकर भगवान कुछ क्षण विचार में डूब गए और फिर बोले, “हे प्रिय! अब तुम मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें उस दिव्य लोक में ले चलता हूँ, जहाँ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम निवास करते हैं। वही तुम्हारे दुःख का निवारण करेंगे।”

इसके बाद भगवान विष्णु अधिक मास का हाथ पकड़कर उसे गोलोक ले गए। यह गोलोक अत्यंत दिव्य और अलौकिक स्थान है, जहाँ केवल प्रकाश ही प्रकाश है। जैसे करोड़ों सूर्य एक साथ चमक रहे हों। वह लोक सभी लोकों से श्रेष्ठ, नित्य और परम आनंद से परिपूर्ण है।

गोलोक का वर्णन करते हुए बताया गया कि वहाँ की भूमि रत्नों से बनी हुई है, चारों ओर अद्भुत प्रकाश और सौंदर्य व्याप्त है। वहाँ न कोई रोग है, न शोक, न मृत्यु का भय। सिर्फ शांति और आनंद ही आनंद है। उस दिव्य लोक के नीचे बैकुण्ठ और शिवलोक स्थित हैं, जहाँ भगवान विष्णु और भगवान शिव अपने-अपने भक्तों के साथ निवास करते हैं।

गोलोक के भीतर एक अद्भुत ज्योति विराजमान है, जो परमानंद का स्रोत है। उसी ज्योति के मध्य में भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य स्वरूप प्रकट होता है। उनका रूप अत्यंत मनोहर है: श्याम वर्ण, कमल के समान नेत्र, मधुर मुस्कान, हाथ में मुरली, पीताम्बर धारण किए हुए, वनमाला से सुशोभित। उनके मुख की आभा करोड़ों चन्द्रमाओं के समान शीतल और आकर्षक है।

भगवान श्रीकृष्ण वहाँ रासमण्डल के मध्य विराजमान हैं, चारों ओर गोपियाँ और भक्तगण हैं। वे पूर्ण परब्रह्म, समस्त सृष्टि के आधार और सभी आनंदों के स्रोत हैं। वे भक्तों पर असीम कृपा करने वाले, निःस्पृह, निर्विकार और सर्वशक्तिमान हैं।

भगवान विष्णु अधिक मास को उसी गोलोक में लेकर पहुँचे, ताकि वह स्वयं श्रीकृष्ण के दर्शन कर सके और अपनी पीड़ा से मुक्त हो सके। यह दृश्य अत्यंत दिव्य और अद्भुत था।

सूतजी कहते हैं- इस प्रकार भगवान नारायण ने यह अद्भुत कथा कहकर कुछ समय के लिए मौन धारण किया। यह सुनकर नारद मुनि अत्यंत उत्सुक हो उठे और आगे की कथा जानने के लिए पुनः प्रश्न करने लगे।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 6 (कथारूप सार)

देवर्षि नारद ने भगवान नारायण से विनम्रतापूर्वक पूछा, “हे प्रभु! जब भगवान विष्णु अधिक मास को लेकर गोलोक पहुँचे, तब वहाँ क्या हुआ? कृपा करके विस्तार से बताइए।”

भगवान नारायण बोले, “हे नारद! ध्यानपूर्वक सुनो। जब भगवान विष्णु अधिक मास को साथ लेकर गोलोक पहुँचे, तब उन्होंने दूर से ही उस दिव्य धाम को देखा। वह स्थान मणियों के खम्भों से सुशोभित, अद्भुत प्रकाश से भरा हुआ और अलौकिक तेज से युक्त था। उस तेज को देखकर भगवान विष्णु के नेत्र कुछ समय के लिए चकाचौंध हो गए। फिर धीरे-धीरे उन्होंने अपनी आँखें खोलीं और अधिक मास को साथ लेकर आगे बढ़े।”

मंदिर के समीप पहुँचकर द्वारपालों ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया। भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न होकर भीतर गए और वहाँ रत्नमय सिंहासन पर विराजमान भगवान श्रीकृष्ण को साष्टांग प्रणाम किया। श्रीकृष्ण गोपियों के मध्य रासमण्डल में विराजमान थे: श्यामवर्ण, मुरलीधारी, पीताम्बर धारण किए हुए, अत्यंत मनोहर और दिव्य स्वरूप वाले।

भगवान विष्णु ने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की, “हे गोविन्द! आप गुणों से परे, अविनाशी, अद्वितीय और सम्पूर्ण सृष्टि के आधार हैं। आप रासलीला के स्वामी, भक्तों के प्रिय और परम आनन्द के स्रोत हैं। मैं आपको बारंबार नमस्कार करता हूँ।”

स्तुति के बाद भगवान विष्णु को श्रीकृष्ण की आज्ञा से सिंहासन पर स्थान मिला। फिर उन्होंने काँपते हुए अधिक मास को आगे लाकर श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम कराया।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने आश्चर्य से पूछा, “हे विष्णु! यह कौन है? यह यहाँ क्यों आया है? और यह इतना दुखी क्यों है? गोलोक में तो कोई भी दुखी नहीं होता। यहाँ तो सब आनंद में रहते हैं, फिर यह रो क्यों रहा है?”

तब भगवान विष्णु खड़े होकर विनम्रता से बोले, “हे प्रभु! यह अधिक मास है। इसका कोई स्वामी नहीं है, इसलिए सभी इसे तुच्छ समझते हैं। इसमें सूर्य की संक्रांति नहीं होती, इस कारण इसे अशुभ और ‘मलमास’ कहा जाता है। सभी शुभ कार्यों में इसे वर्जित किया जाता है और इसका अपमान किया जाता है।”

वे आगे बोले, “हे नाथ! अन्य सभी मास, काल, ऋतु और संवत्सर अपने-अपने स्वामियों के कारण सम्मानित हैं, परन्तु यह अकेला और निराश्रित है। इसी कारण यह अत्यंत दुखी होकर मरने तक का विचार कर बैठा था। तब यह मेरी शरण में आया, और मैं इसे आपके पास लेकर आया हूँ। इसका दुःख अत्यंत गहरा है, जिसे केवल आप ही दूर कर सकते हैं।”

भगवान विष्णु ने आगे विनती की, “हे प्रभु! वेदों में कहा गया है कि आप दूसरों के दुःख को सहन नहीं कर सकते। जो आपकी शरण में आता है, वह कभी दुःखी नहीं रहता। इसलिए इस अधिमास पर कृपा कर इसका दुःख दूर कीजिए। मेरा यहाँ आना तभी सफल होगा।”

इतना कहकर भगवान विष्णु हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण के सामने खड़े हो गए और उनके उत्तर की प्रतीक्षा करने लगे।

यह सब सुनकर मुनिगण अत्यंत उत्सुक हो उठे। उन्होंने कहा—”हे सूतजी! आप हमें आगे की कथा सुनाइए। भगवान श्रीकृष्ण ने इस पर क्या उत्तर दिया? उन्होंने अधिक मास के साथ क्या किया?”


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 7 (कथारूप सार)

नैमिषारण्य में बैठे ऋषियों ने जब सूतजी से पूछा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अधिक मास के दुःख को सुनकर क्या किया, तब सूतजी ने सातवें अध्याय की यह दिव्य कथा सुनाई।

सूतजी बोले, “हे मुनियों! यही प्रश्न नारद जी ने भी भगवान नारायण से किया था, और अब मैं वही उत्तर आपको सुनाता हूँ।”

भगवान नारायण बोले, “हे नारद! जब भगवान विष्णु ने अधिक मास की पीड़ा श्रीकृष्ण के सामने रखी, तब गोलोकनाथ श्रीकृष्ण ने अत्यंत करुणा और प्रसन्नता से कहा, “हे विष्णु! तुमने बहुत अच्छा किया जो इस मलमास को यहाँ ले आए। अब इसका उद्धार निश्चित है।”

भगवान श्रीकृष्ण ने आगे कहा, “जिसे तुमने स्वीकार किया है, उसे मैंने भी स्वीकार किया। आज से मैं इसे अपने समान महान बना देता हूँ। मेरे जितने भी गुण, यश, ऐश्वर्य और महिमा हैं, वे सब मैं इसे प्रदान करता हूँ। अब से यह ‘मलमास’ नहीं, बल्कि ‘पुरुषोत्तम मास’ के नाम से प्रसिद्ध होगा।”

उन्होंने घोषणा की, “आज से मैं स्वयं इसका स्वामी हूँ। यह सभी महीनों में श्रेष्ठ और पूजनीय होगा। जो भी श्रद्धा से इस मास में व्रत, जप, दान और पूजा करेगा, उसके सभी दुःख, पाप और दरिद्रता नष्ट हो जाएँगे।”

भगवान ने आगे इसकी महिमा बताते हुए कहा, “अन्य मासों में किए गए पुण्य सीमित फल देते हैं, परंतु इस पुरुषोत्तम मास में किया गया एक छोटा-सा पुण्य भी करोड़ों गुना फल देता है। जो मनुष्य इस मास में भक्ति करता है, वह बिना कठिन तपस्या के ही मेरे परम धाम को प्राप्त कर सकता है।”

उन्होंने यह भी कहा, “जो लोग इस मास का अनादर करते हैं, धर्म-कर्म नहीं करते, स्नान, दान और जप से दूर रहते हैं, वे दुर्भाग्यशाली होते हैं और उन्हें जीवन में दुःख ही मिलता है। परन्तु जो श्रद्धा और विश्वास से इस मास का पालन करते हैं, उन्हें धन, संतान, सुख और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।”

भगवान श्रीकृष्ण ने विशेष रूप से कहा, “मेरे इस पुरुषोत्तम मास के भक्त मुझे अत्यंत प्रिय हैं। उनके छोटे-से प्रयास पर भी मैं प्रसन्न हो जाता हूँ और उनकी मनोकामनाएँ शीघ्र पूरी करता हूँ। उनके दोषों को भी मैं नहीं देखता।”

उन्होंने आगे निर्देश दिया, “जब भी यह पुरुषोत्तम मास आए, तब सभी को अपनी शक्ति के अनुसार स्नान, पूजा, जप और दान अवश्य करना चाहिए। यही सबसे श्रेष्ठ साधन है और यही जीवन को सफल बनाने का सरल मार्ग है।”

अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने विष्णु से कहा, “अब आप इस पुरुषोत्तम मास को साथ लेकर वैकुण्ठ लौट जाओ और इसे जगत में स्थापित करो, ताकि सभी लोग इसका पालन करें और इसका लाभ प्राप्त करें।” 

भगवान श्रीकृष्ण के ये वचन सुनकर भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने श्रीकृष्ण को प्रणाम किया और अधिक मास, जो अब पुरुषोत्तम मास बन चुका था, को साथ लेकर गरुड़ पर सवार होकर वैकुण्ठ लौट गए।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 8 (कथारूप सार)

नैमिषारण्य में बैठे सूतजी से ऋषियों ने प्रश्न किया कि जब भगवान विष्णु अधिक मास को लेकर वैकुण्ठ लौट गए, तब आगे क्या हुआ?” इस प्रश्न पर सूतजी ने पुरुषोत्तम मास माहात्म्य के आठवें अध्याय की कथा सुनाई।

सूतजी बोले, “हे मुनियों! यही प्रश्न नारद जी ने भी भगवान नारायण से किया था?”

तब भगवान नारायण ने उत्तर दिया, “हे नारद! विष्णुजी अधिक मास को अपने साथ वैकुण्ठ ले गए और वहाँ उसे अपने समीप स्थान दिया। अब वह अधिक मास, जो पहले अपमानित था, बारहों महीनों में श्रेष्ठ बन गया और ‘पुरुषोत्तम मास’ के रूप में प्रतिष्ठित होकर सम्मानित होने लगा।”

इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों की ओर देखकर उनसे कहा, “हे युधिष्ठिर! ऐसा प्रतीत होता है कि वनवास के समय आप लोगों ने पुरुषोत्तम मास का आदर नहीं किया, इसी कारण आप इतने दुःखों को भोग रहे हैं। भय, शोक और विपत्तियों में फँसे रहने के कारण आपने इस पवित्र मास का महत्व नहीं समझा।”

भगवान ने आगे समझाया, “मनुष्य को अपने भाग्य पर विश्वास रखना चाहिए, क्योंकि सुख-दुःख, लाभ-हानि सब उसी के अनुसार प्राप्त होते हैं। परन्तु एक और कारण भी है, जिसके कारण तुम्हें यह कष्ट सहना पड़ रहा है। अब मैं वह पुरातन कथा सुनाता हूँ।”

इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण द्रौपदी के पूर्व जन्म की कथा सुनाते हैं।

उन्होंने कहा, “पूर्व जन्म में द्रौपदी एक महात्मा ‘मेधावी ऋषि’ की अत्यंत सुन्दर और गुणवान पुत्री थी। वह रूप, विद्या और नीति में निपुण थी और अपने पिता की अत्यंत प्रिय थी। किंतु उसके मन में एक ही चिंता थी। उसे योग्य पति और संतान-सुख कैसे प्राप्त होगा।”

समय बीतता गया, परन्तु उसका विवाह नहीं हो सका। वह अपनी सखियों को पति और परिवार का सुख भोगते देख स्वयं भी उस सुख की कामना करने लगी। वह चिंतित रहने लगी कि कौन-सा उपाय, कौन-सी उपासना या कौन-सा पुण्य कार्य उसे यह सुख दिला सकता है।

उधर उसके पिता मेधावी ऋषि भी उसके योग्य वर की खोज में देश-देशांतर भटकते रहे, परन्तु उन्हें कोई योग्य वर नहीं मिला। इस कारण वे अत्यंत चिंतित और निराश हो गए। इसी चिंता और भाग्य के प्रबल प्रभाव से वे गंभीर रोग से ग्रस्त हो गए और अंततः उनका देहांत हो गया।

मृत्यु के समय उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया, जिससे भगवान के दूत उन्हें अपने साथ दिव्य लोक में ले गए।

अपने पिता की मृत्यु देखकर वह कन्या अत्यंत दुःखी हो गई। वह विलाप करने लगी, “हे पिताजी! अब मैं अनाथ हो गई हूँ। मेरी रक्षा कौन करेगा? मेरा पालन-पोषण कौन करेगा?” वह अपने पिता के शरीर को गोद में लेकर रोती रही।

उसका करुण विलाप सुनकर आसपास के मुनि वहाँ आए और उन्होंने विधिपूर्वक मेधावी ऋषि का अंतिम संस्कार किया। फिर वे कन्या को समझाकर अपने-अपने आश्रम लौट गए।

अब वह कन्या अकेली, दुःख से व्याकुल होकर उसी वन में रहने लगी। पिता के वियोग का दुःख उसे भीतर ही भीतर जलाता रहा। वह न तो ठीक से खा पाती थी, न ही शांत रह पाती थी। जैसे बछड़े के वियोग में गाय व्याकुल हो जाती है, वैसे ही वह भी शोक में डूबी रहती थी।

इस प्रकार आठवें अध्याय में द्रौपदी के पूर्व जन्म की करुण कथा का आरम्भ होता है, जिससे यह समझ आता है कि उसके वर्तमान जीवन के दुःखों का संबंध उसके पूर्व जन्म के कर्मों से है। यह कथा आगे बताती है कि कैसे पुरुषोत्तम मास का पालन जीवन के दुःखों को दूर करने का उपाय बनता है।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 9 (कथारूप सार)

सूतजी बताते हैं कि मेधावी ऋषि की कन्या, अपने पिता के निधन के बाद अत्यंत दुःख और अकेलेपन में जीवन व्यतीत कर रही थी। उसका हृदय शोक से भरा हुआ था। वह न केवल माता-पिता से विहीन थी, बल्कि अपने भविष्य को लेकर भी चिंतित थी।

वह कन्या एक सूनी हिरणी की तरह भयभीत और असहाय होकर अपने घर में रहती थी। उसके नेत्र आँसुओं से भरे रहते, हृदय दुःख की अग्नि में जलता रहता, और हर क्षण वह अपने जीवन का कोई मार्ग नहीं देख पाती थी। उसके मन में सबसे बड़ा दुःख यह था कि उसका विवाह नहीं हुआ था और अब उसके जीवन का क्या होगा। यह चिंता उसे भीतर से तोड़ रही थी।

उसी समय, उसके दुःख को दूर करने के लिए दिव्य संयोग से महान तपस्वी दुर्वासा ऋषि वहाँ पधारे। वे अत्यंत तेजस्वी, क्रोधी किन्तु कृपालु मुनि थे, जिनकी महिमा स्वयं देवताओं तक में प्रसिद्ध थी। उन्हें देखकर कन्या के मन में आशा की किरण जागी।

कन्या ने अत्यंत श्रद्धा और विनम्रता से दुर्वासा ऋषि का स्वागत किया। अर्घ्य, पाद्य और वन में उपलब्ध फल-फूल से उनकी पूजा की। उसने उन्हें प्रणाम करते हुए कहा कि आज उसका जीवन धन्य हो गया, क्योंकि एक महान संत उसके द्वार पर आए हैं। उसने यह भी कहा कि शायद उसके पिता के पुण्यों के कारण ही यह सौभाग्य उसे प्राप्त हुआ है।

दुर्वासा ऋषि उसके सेवा-भाव और विनम्रता से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा कि वह एक श्रेष्ठ कुल की, धर्मपरायण और पुण्यात्मा कन्या है। उसके पिता का तप सफल हुआ है, जो उसे ऐसी कन्या प्राप्त हुई।

तब कन्या ने अपने हृदय का सारा दुःख उनके सामने प्रकट किया। उसने कहा कि वह अनाथ है, उसका कोई सहारा नहीं है, और विवाह न होने के कारण उसका जीवन अधूरा रह गया है। उसे यह भय सता रहा था कि यदि शीघ्र विवाह न हुआ तो उसका जीवन व्यर्थ हो जाएगा।

उसकी करुण वाणी सुनकर दुर्वासा ऋषि का हृदय द्रवित हो गया। यद्यपि वे स्वभाव से क्रोधी थे, परन्तु भीतर से अत्यंत दयालु थे। उन्होंने कन्या के दुःख को समझा और उसके कल्याण के लिए उपाय सोचने लगे।

अंततः उन्होंने उसे एक ऐसा दिव्य और सारभूत उपाय बताने का निश्चय किया, जिससे उसके जीवन का दुःख दूर हो सके और उसका भविष्य उज्ज्वल बन सके।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 10 (कथारूप सार)

जब उस दुखी कन्या ने महर्षि दुर्वासा ऋषि के सामने अपना दुःख प्रकट किया, तब दयालु मुनि ने उसके कल्याण के लिए एक अत्यंत गुप्त और महान उपाय बताया। उन्होंने कहा कि शीघ्र ही आने वाला पुरुषोत्तम मास सभी मासों में श्रेष्ठ है और इसमें किया गया स्नान, दान, जप और भगवान की पूजा असंख्य गुना फल देने वाली होती है।

उन्होंने समझाया कि इस पवित्र मास में केवल एक बार तीर्थ स्नान करने से भी उतना ही पुण्य प्राप्त होता है, जितना हजारों वर्षों तक तप और गंगास्नान करने से मिलता है। यह मास स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय है, और इसमें की गई भक्ति से मनुष्य की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

दुर्वासा ऋषि ने अपने जीवन का एक प्रसंग भी बताया कि किस प्रकार उन्होंने क्रोध में राजा अम्बरीष को नष्ट करने का प्रयास किया था, लेकिन भगवान के सुदर्शन चक्र से स्वयं संकट में पड़ गए। तब इस पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से ही वे उस भयंकर संकट से बच सके। इस प्रकार उन्होंने कन्या को दृढ़ता से इस मास का व्रत करने का उपदेश दिया।

लेकिन उस कन्या ने मुनि के वचनों को स्वीकार नहीं किया। उसने तर्क करते हुए कहा कि अन्य मास जैसे कार्तिक, वैशाख आदि भी तो महान हैं, फिर यह ‘मलमास’ कैसे श्रेष्ठ हो सकता है? उसने इस मास की महिमा को समझने के बजाय उसका तिरस्कार किया।

यह सुनकर दुर्वासा ऋषि अत्यंत क्रोधित हुए, उनके नेत्र लाल हो उठे, परंतु करुणा के कारण उन्होंने उसे श्राप नहीं दिया। उन्होंने सोचा कि यह कन्या अज्ञानवश ऐसा कह रही है और अभी इसके पास सही समझ नहीं है। इसलिए उन्होंने केवल इतना कहा कि पुरुषोत्तम मास का अनादर करने का फल उसे अवश्य भोगना पड़ेगा, चाहे इस जन्म में या अगले जन्म में।

इसके बाद दुर्वासा ऋषि वहाँ से चले गए। उनके जाने के बाद कन्या का तेज और सौभाग्य क्षीण होने लगा। तब उसे अपने निर्णय पर विचार आया, लेकिन अब वह अलग मार्ग चुन चुकी थी।

अंततः उसने निश्चय किया कि वह भगवान शिव की कठोर तपस्या करेगी, क्योंकि उसे लगा कि वही उसके दुःखों का निवारण कर सकते हैं। इस प्रकार वह पुरुषोत्तम मास की महिमा को त्यागकर, अपने ही मार्ग पर चल पड़ी।


निष्कर्ष

पुरुषोत्तम मास केवल एक अतिरिक्त मास नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा का प्रतीक है। यह मास भक्ति, साधना, दान, जप और तप के माध्यम से मनुष्य को आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की ओर ले जाता है।

इस पवित्र मास में श्रद्धा और विश्वास के साथ किए गए छोटे-से पुण्य कार्य भी अनंत फल प्रदान करते हैं। इसलिए प्रत्येक भक्त को पुरुषोत्तम मास का आदर करते हुए भगवान की भक्ति में समय व्यतीत करना चाहिए।


Source: narayanseva.org

Read in Hindi - Purushottam Maas Mahatmya Katha in 3 parts :








Jagannath Yatra 2025 in Puri : A Timeless Journey of Faith and the Rare Nabakalebara Ritual




Every summer, the coastal town of Puri, Odisha, transforms into a sea of devotion for the Jagannath Rath Yatra. In 2025, this grand chariot festival, set for June 27, will draw millions to witness Lord Jagannath, his brother Balabhadra, and sister Subhadra journey from the Jagannath Temple to the Gundicha Temple. The festival, rooted in centuries-old tradition, is a celebration of faith, unity, and divine connection. The Jagannath Yatra 2025 promises to continue this timeless tradition, drawing millions of devotees and curious travelers from across the globe.


A Walk Through History:

The story of the Yatra is steeped in mythology. Legend has it that Lord Jagannath, an incarnation of Krishna, wishes to visit his birthplace, Mathura, annually. Accompanied by his siblings, he embarks on this symbolic journey to the Gundicha Temple, believed to be their aunt’s abode. The sight of massive wooden chariots—Nandighosa (Jagannath’s, with 16 wheels), Taladhwaja, and Darpadalana—pulled by thousands through Puri’s Grand Road is awe-inspiring. The Chhera Pahanra ritual, where the King of Puri sweeps the chariots with a golden broom, underscores humility before the divine.


The Unique Ritual: Nabakalebara:

A rare highlight is the Nabakalebara ritual, occurring every 12–19 years when the deities’ wooden idols are replaced. Guided by celestial alignments, priests seek sacred neem trees marked with divine symbols like conchs and chakras. In a secretive midnight ceremony, the Brahma Padartha, the deities’ spiritual essence, is transferred to new idols, with priests blindfolded to preserve the mystery. The old idols are buried in Koili Baikuntha, symbolizing life’s cyclical nature. The next Nabakalebara is slated for 2034, making 2025’s Yatra a vibrant precursor.


More Than Just a Festival:

Jagannath Yatra is not merely a religious tradition; it is a celebration of unity, culture, and devotion. The sight of lakhs of people pulling the colossal chariots together transcends caste, creed, and background, offering a rare moment of collective spiritual connection.

In 2025, as the majestic chariots roll through the streets of Puri once again, they will carry with them centuries of faith, stories, and the undying spirit of the people.

Puri’s streets will pulse with chants, drums, and devotion. From Snana Purnima’s ritual bath to the Suna Besha’s golden adornments, every moment feels alive. Join this spiritual spectacle to experience India’s cultural heartbeat—book early, embrace the chaos, and let Jagannath’s grace guide you.




Understanding Satta Matka: How It Works and Earning Potential


Satta Matka is a form of lottery-style gambling that originated in India in the 1950s, initially involving betting on the opening and closing rates of cotton traded on the New York Cotton Exchange. Over time, it evolved into a numbers-based betting game. Below is an explanation of how Satta Matka works and how users can earn money from it, based on available information.

How Satta Matka Works

1. Game Structure:

   - Satta Matka is a number-guessing game where players bet on numbers ranging from 0 to 9.

   - Players select numbers in various formats, such as:

     - Single: A single number (0-9).

     - Jodi: A pair of numbers (e.g., 56).

     - Panna/Patti: A three-digit number (e.g., 128, categorized as Single Panna, Double Panna, or Triple Panna).

     - Open and Close: Players bet on numbers for the "open" (first draw) or "close" (second draw) results, or both.

   - Numbers are typically drawn twice daily, with results announced as "Open" and "Close" (e.g., 3-5-6 for Open, 7-8-9 for Close).


2. Betting Process:

   - Players place bets on their chosen numbers or combinations through a bookie or, more commonly today, online platforms.

   - Bets are placed with a specific amount of money (e.g., ₹10, ₹50).

   - A random number generator or card-drawing system (in modern online versions) determines the winning numbers. Historically, numbers were drawn from a physical "matka" (earthen pot) containing slips with numbers.

3. Game Variants:

   - Popular variants include Kalyan Matka (played daily) and Worli Matka (played five days a week, Monday to Friday).

   - Other markets like Rajdhani Matka, Milan Matka, and Main Mumbai Matka have specific schedules and payout structures.

4. Result Announcement:

   - Results are announced on designated websites, apps, or through bookies. For example, a result might be displayed as "235-0-789," where 235 is the Open Panna, 0 is the Open Single, and 789 is the Close Panna.

   - Players check if their chosen numbers match the drawn results.


How Money Is Earned by Users

1. Payout Structure:

   - Earnings depend on the type of bet and the amount wagered. Different bets have different payout ratios:

     - Single: Betting on a single number (0-9) typically pays 9:1. For example, a ₹10 bet wins ₹90.

     - Jodi: Betting on a pair of numbers (00-99) pays 90:1. A ₹10 bet on a correct Jodi wins ₹900.

     - Panna/Patti: Betting on a three-digit combination can pay 100:1 to 1000:1, depending on the variant (e.g., Single Panna, Double Panna, Triple Panna). A ₹10 bet might win ₹1000 or more.

     - Sangam: Betting on both Open and Close combinations can yield payouts up to 1000:1 or 12,000:1, though this is rare.

   - The payout formula is generally: Bet Amount × Payout Ratio = Winning Amount. For instance, a ₹50 bet on a Single with a 9:1 payout yields ₹450 (50 × 9).

2. Example of Earnings:

   - If a player bets ₹10 on the number 5 for a Single and it appears in the Open or Close result, they earn ₹90 (9:1 payout).

   - If they bet ₹10 on a Jodi like 56 and it matches the result, they earn ₹900 (90:1 payout).

   - Higher bets increase winnings proportionally (e.g., ₹50 on a Jodi could yield ₹4500), but the risk of loss is also higher.

3. High-Risk, High-Reward:

   - Satta Matka is designed to favor organizers, with a low probability of winning (e.g., 1% for some bets).

   - The game’s allure lies in the potential for large payouts from small bets. Stories of players like Ratan Khatri, Kalyanji Bhagat, and Suresh Bhagat becoming wealthy highlight this, though such outcomes are rare.

Key Considerations

- Legality: Satta Matka is illegal in most parts of India under the Public Gambling Act of 1867, except in states like Goa, Daman, and Sikkim, where gambling is legalized. Online Satta Matka operates in a legal gray area, but players risk fines or imprisonment if caught

- Risks: The game is heavily luck-based, with no guaranteed strategies for winning. Organizers structure the game to maximize their profits, often leading to significant losses for players. Doubling bets to recover losses can be particularly dangerous.

- Online Platforms: Modern Satta Matka is predominantly played online via websites (e.g., DPBoss, SPBoss) or apps, offering live results, guessing forums, and tips. These platforms claim to enhance winning chances but often prioritize organizer profits.

Critical Note : Satta Matka is a speculative game with significant financial and legal risks. While it offers the potential for quick earnings, the odds are stacked against players, and losses are common. Responsible play, if one chooses to participate, involves setting strict limits on betting amounts and avoiding chasing losses. Always verify the legal status of gambling in your region before engaging.

Disclaimer: This blog post is for informational purposes only and does not endorse or promote gambling. Satta Matka is illegal in many regions, and participation may lead to legal and financial risks. Always verify local laws before engaging in any form of gambling.




Newer Posts Older Posts Home

Subscribe via email

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

You May Like To See

BLUEiCYMiND Life Quotes

Scroll Ads

About Me

My photo
Mumbai, Maharastra, India
MY NAME IS HITENDRA V BARI. Masters in Physics and then working as a Digital Marketing Manager (SEO, SEM, SMM and Research analyst). I'm regular , parttime blogger like to blogs on various trending, on going topics but in different way. One of my biggest dream is that to give speech on stage, with a lakhs of people viewing me live around the world.

Followers

Blueicymind Archives


Recent Comments