BLUEiCYMiND Love-Stories

Purushottam Maas Mahatmya Katha from Chapter 21 to 31 : पुरुषोत्तम मास महात्म्य कथा अध्याय 21 से अध्याय 31 तक


सनातन धर्म की दिव्य परंपरा में पुरुषोत्तम मास को साधना, भक्ति और आत्मशुद्धि का सर्वोत्तम काल माना गया है। यह मास भगवान श्रीहरि की विशेष कृपा का प्रतीक है, जिसमें किया गया प्रत्येक शुभ कर्म अनेक गुना फल प्रदान करता है और साधक के जीवन को पवित्रता से भर देता है।

आपने अब तक अध्याय 11 से 20 तक की कथा में भक्ति, तपस्या, धर्मपालन और भगवान की करुणा से जुड़े अनेक प्रेरणादायक प्रसंगों का श्रवण किया। अब आगे अध्याय 21 से 31 तक की कथा में पुरुषोत्तम मास का और भी गहन माहात्म्य, अद्भुत घटनाएँ और जीवन को दिशा देने वाले उपदेश विस्तार से मिलते हैं।

इन अंतिम अध्यायों में यह बताया गया है कि कैसे इस मास का प्रभाव, पापी से पापी जीव का भी उद्धार कर सकता है। कथा के माध्यम से व्रत, दान, तीर्थ, सेवा और सदाचार के महत्व को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से समझाया गया है। साथ ही, यह भी स्पष्ट होता है कि चाहे अनजाने में ही क्यों न हो, यदि कोई पुरुषोत्तम मास का स्पर्श कर लेता है, तो भी वह बड़े फल का अधिकारी बन जाता है।

अब श्रद्धा और भक्ति के साथ पुरुषोत्तम मास महात्म्य कथा के अध्याय 21 से 31 के दिव्य प्रसंगों का रसपान करें और अपने जीवन को धर्ममय तथा पुण्यमय बनाने की प्रेरणा प्राप्त करें।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 21 (कथारूप सार)

बाल्मीकि मुनि बोले, हे राजन्! अब मैं तुम्हें पुरुषोत्तम मास की एक अत्यंत पवित्र और रहस्यमयी कथा सुनाता हूँ, जिसे सुनकर मनुष्य का जीवन धन्य हो जाता है।

प्राचीन समय में एक जिज्ञासु राजा ने मुनियों से पूछा, “हे महर्षियों! भगवान की पूजा का सही स्वरूप क्या है? किस प्रकार की पूजा से भगवान वास्तव में प्रसन्न होते हैं?” तब मुनियों में श्रेष्ठ बाल्मीकि जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “हे राजन्! केवल प्रतिमा स्थापित कर देना ही पर्याप्त नहीं होता, जब तक उसमें विधिपूर्वक प्राणप्रतिष्ठा न की जाए, तब तक वह प्रतिमा केवल धातु के समान ही रहती है।”

उन्होंने आगे कहा, “जो साधक भगवान्‌ के बीज मंत्रों और वैदिक मंत्रों से श्रद्धापूर्वक प्रतिमा में प्राणों का आवाहन करता है, वही उस प्रतिमा को सजीव बना देता है। तब उसमें स्वयं भगवान का निवास हो जाता है।”

यह सुनकर राजा अत्यंत चकित हुआ और बोला, “हे मुनिवर! इसके बाद क्या करना चाहिए?”

बाल्मीकि मुनि बोले, “इसके बाद साधक को अपने मन को एकाग्र करके भगवान पुरुषोत्तम का ध्यान करना चाहिए। वे श्यामवर्ण, श्रीवत्स चिह्न से युक्त, त्रिभंग मुद्रा में, और राधारानी के साथ अत्यंत मनोहर रूप में विराजमान हैं।”

फिर उन्होंने समझाया, “हे राजन्! जब साधक संकल्प लेकर, नियम और पवित्रता के साथ भगवान का षोडशोपचार पूजन करता है, तब वह भगवान के अत्यंत निकट पहुँच जाता है। वह उन्हें आसन देता है, चरण धोने के लिए पाद्य अर्पित करता है, अर्घ्य, आचमन, स्नान और पंचामृत से उनका अभिषेक करता है। फिर उन्हें वस्त्र, चंदन, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करता है।”

मुनि ने आगे कहा, “जब भक्त प्रेमपूर्वक भगवान के अंगों का पूजन उनके विभिन्न नामों से करता है, तब उसका हृदय पूर्णतः भक्ति में डूब जाता है। इसके बाद वह आरती करता है, प्रदक्षिणा करता है और भगवान्‌ की स्तुति करता है।”

राजा ने विनम्रता से पूछा, “हे प्रभो! यदि पूजा में कोई त्रुटि हो जाए तो?”

तब बाल्मीकि जी बोले, “हे राजन्! मनुष्य से भूल होना स्वाभाविक है। इसलिए अंत में ‘मन्त्रहीनं क्रियाहीनं‘ कहकर भगवान्‌ से क्षमा याचना करनी चाहिए। भगवान तो भाव के भूखे हैं, वे सच्चे हृदय की भक्ति को ही स्वीकार करते हैं।”

फिर उन्होंने कहा, “पुरुषोत्तम मास में जो भक्त प्रतिदिन तिल से हवन करता है और घृत का अखंड दीप प्रज्वलित रखता है, उस पर भगवान विशेष कृपा करते हैं।”

अंत में बाल्मीकि मुनि ने कहा, “हे राजन्! जो मनुष्य इस पवित्र पुरुषोत्तम मास में श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ भगवान्‌ श्रीकृष्ण का पूजन करता है, वह इस संसार में सभी सुखों को भोगकर अंत में परम धाम को प्राप्त करता है।”

यह सुनकर राजा का हृदय भक्ति से भर गया और उसने निश्चय किया कि वह भी पुरुषोत्तम मास में विधिपूर्वक भगवान का पूजन करेगा।

इस प्रकार यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा, विधिपूर्वक पूजा और भगवान्‌ के प्रति पूर्ण समर्पण ही जीवन को सफल बनाते हैं।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 22 (कथारूप सार)

एक समय की बात है, धर्मपरायण और जिज्ञासु राजा दृढ़धन्वा के मन में पुरुषोत्तम मास के व्रत को लेकर अनेक प्रश्न उठे। वे जानना चाहते थे कि इस पवित्र मास में कौन-से नियमों का पालन करना चाहिए और किन बातों से दूर रहना चाहिए। वे विनम्र होकर बाल्मीकि मुनि से बोले, “हे तपोधन! कृपा करके मुझे विस्तार से बताइए कि इस व्रत में क्या करना उचित है और क्या त्याज्य है?”

तब भगवान्‌ की प्रेरणा से महर्षि बाल्मीकि ने मुस्कुराते हुए कहा, “हे राजन्! तुमने अत्यंत कल्याणकारी प्रश्न किया है। ध्यानपूर्वक सुनो, मैं तुम्हें पुरुषोत्तम मास के नियम संक्षेप में बताता हूँ।”

उन्होंने आगे कहा, “इस मास में व्रती को संयम और पवित्रता के साथ रहना चाहिए। उसे हविष्य अन्न का सेवन करना चाहिए। ऐसा सादा और सात्विक भोजन जो बिना तेल-मसाले के बना हो और जिसमें शुद्धता हो। यह भोजन उपवास के समान फल देने वाला माना गया है।”

राजा ने पुनः पूछा, “हे मुनिवर! किन वस्तुओं का त्याग करना चाहिए?”

बाल्मीकि जी बोले, “हे राजन्! इस व्रत में मांस, मदिरा, शहद, तिल का तेल, राजमाष, राई और सभी तामसिक पदार्थों का त्याग करना चाहिए। साथ ही, बासी अन्न, दूषित भोजन, और दूसरे के हाथ का अन्न भी नहीं लेना चाहिए। प्याज, लहसुन, गाजर, मूली आदि भी त्याज्य हैं।”

फिर उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, “केवल भोजन ही नहीं, आचरण की शुद्धता भी आवश्यक है। व्रती को किसी से वैर नहीं रखना चाहिए, किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिए। चाहे वह देवता हों, गुरु हों, ब्राह्मण हों या कोई भी प्राणी। पराई स्त्री से दूर रहना, ब्रह्मचर्य का पालन करना और मन, वचन, कर्म से पवित्र रहना, ये सब इस व्रत के मूल आधार हैं।”

राजा अत्यंत ध्यान से सुन रहे थे।

बाल्मीकि मुनि ने आगे कहा, “इस मास में व्रती को पृथ्वी पर शयन करना चाहिए, पत्तल में भोजन करना चाहिए और दिन में एक बार या नियत समय पर ही भोजन करना चाहिए। यदि सामर्थ्य हो तो उपवास, नक्त व्रत या एकभुक्त व्रत का पालन करना चाहिए।”

उन्होंने यह भी बताया, “जो व्यक्ति इस मास में श्रद्धा से भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करता है, श्रीमद्भागवत का श्रवण करता है या तुलसीदल से शालिग्राम का पूजन करता है, उसे अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है।”

फिर उन्होंने एक अद्भुत रहस्य बताया, “हे राजन्! जो इस व्रत का पालन करता है, उसके पास यमदूत भी नहीं आते। उसके शरीर में समस्त तीर्थों और देवताओं का निवास होता है। उसके जीवन से दुःस्वप्न, दरिद्रता और सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।”

राजा यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गया।

अंत में बाल्मीकि मुनि बोले, “हे राजन्! यह पुरुषोत्तम मास का व्रत सौ यज्ञों से भी श्रेष्ठ है। यज्ञ से स्वर्ग मिलता है, परन्तु इस व्रत से भक्त सीधे भगवान के परम धाम गोलोक को प्राप्त होता है।”

यह सुनकर राजा दृढ़धन्वा का हृदय भक्ति से भर गया। उसने निश्चय किया कि वह पूर्ण श्रद्धा और नियम के साथ इस व्रत का पालन करेगा।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 23 (कथारूप सार)

राजा दृढ़धन्वा के मन में एक नई जिज्ञासा उत्पन्न हुई। वे विनम्र होकर बोले, “हे मुनियों में श्रेष्ठ! पुरुषोत्तम मास में दीपदान का क्या फल है? कृपा करके मुझे विस्तार से बताइए।”

उनके इस प्रश्न को सुनकर महर्षि बाल्मीकि अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, “हे राजन्! अब मैं तुम्हें एक ऐसी अद्भुत कथा सुनाता हूँ, जिसे सुनने मात्र से ही बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं।”

उन्होंने कथा आरंभ की-

प्राचीन समय में सौभाग्य नामक नगर में चित्रबाहु नाम का एक प्रतापी राजा राज्य करता था। वह अत्यंत बुद्धिमान, धर्मज्ञ, दयालु और भगवान्‌ श्रीकृष्ण का अनन्य भक्त था। उसकी पत्नी चन्द्रकला भी अत्यंत पतिव्रता, गुणवान और भगवान की भक्त थी। दोनों सुखपूर्वक राज्य का पालन करते थे।

एक दिन उस राज्य में महान ऋषि अगस्त्य पधारे। राजा चित्रबाहु ने दूर से ही उन्हें देखा और दौड़कर उनके चरणों में गिर पड़ा। अत्यंत श्रद्धा से उनका सत्कार किया और विनम्र होकर बोला, “हे मुनिश्रेष्ठ! आज मेरा जीवन सफल हो गया, जो आपके दर्शन हुए।”

राजा की भक्ति और विनम्रता से प्रसन्न होकर अगस्त्य मुनि बोले, “हे राजन्! तुम वास्तव में धन्य हो। तुम्हारा राज्य और प्रजा भी धन्य है, क्योंकि तुम वैष्णवों का सम्मान करते हो। जहाँ भगवान्‌ के भक्तों का आदर नहीं होता, वह स्थान रहने योग्य नहीं होता।”

फिर उन्होंने राजा को आशीर्वाद दिया और जाने को उद्यत हुए। तभी राजा ने विनम्रता से एक प्रश्न किया, “हे मुनिवर! मुझे यह अद्भुत ऐश्वर्य, निष्कंटक राज्य और ऐसी पतिव्रता पत्नी कैसे प्राप्त हुई? अवश्य ही यह किसी पूर्व जन्म के पुण्य का फल है, कृपा करके वह रहस्य मुझे बताइए।”

राजा की जिज्ञासा सुनकर अगस्त्य मुनि ध्यान में लीन हो गए और बोले, “हे राजन्! पूर्व जन्म में तुम मणिग्रीव नामक एक शूद्र थे। तुम अत्यंत पापी, हिंसक और दुष्ट आचरण वाले थे। परन्तु तुम्हारी पत्नी उस समय भी अत्यंत पतिव्रता और धर्मनिष्ठ थी। तुम्हारे पापों के कारण तुम्हें समाज और परिवार ने त्याग दिया, और तुम अपनी पत्नी के साथ वन में रहने लगे।”

उन्होंने आगे कहा, “एक दिन वन में तुम्हें उग्रदेव नाम के एक ब्राह्मण मिले, जो रास्ता भटककर अत्यंत प्यास और थकान से व्याकुल होकर मृत्यु के निकट पहुँच गए थे। उस समय तुम्हारे हृदय में करुणा जागी और तुमने अपनी पत्नी के साथ मिलकर उनकी सेवा की। उन्हें जल दिया, विश्राम कराया और फल-कन्द खिलाए।”

तुम्हारी उस निस्वार्थ सेवा से ब्राह्मण अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने तुम्हें आशीर्वाद दिया और तुम्हारे जीवन का कल्याण किया। उसी पुण्य के प्रभाव से तुम अगले जन्म में राजा चित्रबाहु बने और तुम्हें यह समस्त वैभव और सुख प्राप्त हुआ।

बाल्मीकि मुनि ने कथा समाप्त करते हुए कहा, “हे राजन्! यह सब उस छोटे से पुण्य कार्य का परिणाम है, जो तुमने एक ब्राह्मण की सेवा करके किया था। विशेषकर पुरुषोत्तम मास में किया गया दीपदान और सेवा कार्य अनंत फल देने वाला होता है।”

यह सुनकर राजा दृढ़धन्वा और भी अधिक श्रद्धा से भर गया। उसने समझ लिया कि छोटे-से छोटे पुण्य कार्य भी, यदि श्रद्धा और करुणा से किए जाएँ, तो जीवन को बदल सकते हैं।

इस प्रकार यह कथा हमें सिखाती है कि पुरुषोत्तम मास में किया गया दीपदान, सेवा और भक्ति मनुष्य के जीवन को अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाते हैं और उसे महान फल प्रदान करते हैं।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 24 (कथारूप सार)

बाल्मीकि मुनि बोले, “हे राजन्! अब आगे की कथा सुनो, जो मनुष्य के जीवन को बदल देने वाली है।”

जब उग्रदेव मुनि ने मणिग्रीव से उसके जीवन का वृत्तांत पूछा, तब मणिग्रीव अत्यंत विनम्र होकर बोला, “हे ब्रह्मन्! मैं पहले एक नगर में अपनी धर्मपत्नी के साथ सुखपूर्वक रहता था। मैं धनवान था, अच्छे आचरण वाला था, परोपकारी भी था। किन्तु एक समय मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई। मैंने धर्म का त्याग कर दिया, पराई स्त्री का संग किया, अपवित्र वस्तुओं का सेवन किया और चोरी तथा हिंसा में लिप्त हो गया। इसी कारण मेरे बन्धु-बान्धवों ने मेरा त्याग कर दिया और राजा ने मेरा धन भी छीन लिया। अंततः मैं अपनी पत्नी के साथ इस घोर वन में आकर रहने लगा और जीवों की हत्या करके जीवन यापन करने लगा।”

यह कहते हुए वह अत्यंत दुःखी होकर बोला, “हे मुनिश्रेष्ठ! अब आप ही मुझ पर कृपा करें और ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरी दरिद्रता दूर हो जाए और मैं फिर से सुखी जीवन जी सकूँ।”

मणिग्रीव की करुणा भरी वाणी सुनकर उग्रदेव मुनि प्रसन्न हुए और बोले, “हे वत्स! तुमने मेरी सच्चे मन से सेवा की है, इसलिए मैं तुम्हें एक ऐसा सरल उपाय बताता हूँ, जिससे बिना बड़े व्रत, तीर्थ या दान के ही तुम्हारा कल्याण हो जाएगा।”

उन्होंने आगे कहा, “कुछ समय बाद पवित्र पुरुषोत्तम मास आने वाला है। उस मास में तुम अपनी पत्नी के साथ नियमपूर्वक भगवान पुरुषोत्तम की प्रसन्नता के लिए दीपदान करना। यदि संभव हो तो घृत या तिल के तेल से दीप जलाना, परंतु यदि वह भी उपलब्ध न हो तो इंगुदी के तेल से ही दीपदान करना। नित्य स्नान करके श्रद्धा और भक्ति से यह व्रत करना, इससे तुम्हारी दरिद्रता जड़ से समाप्त हो जाएगी।”

मुनि ने आगे दीपदान का महात्म्य बताते हुए कहा, “हे मणिग्रीव! पुरुषोत्तम मास में किया गया दीपदान इतना महान है कि बड़े-बड़े यज्ञ, दान, तीर्थ और व्रत भी उसके बराबर नहीं हो सकते। यह व्रत धन, धान्य, संतान, यश और सुख देने वाला है। जो जिस फल की इच्छा करता है, वह उसे अवश्य प्राप्त करता है। चाहे वह धन हो, विद्या हो, उत्तम जीवनसाथी हो या मोक्ष ही क्यों न हो।”

यह सुनकर मणिग्रीव और उसकी पत्नी के हृदय में आशा जाग उठी। उन्होंने मुनि के चरणों में प्रणाम किया और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

कुछ समय बाद जब पुरुषोत्तम मास आया, तब दोनों ने पूरे नियम और श्रद्धा के साथ दीपदान करना आरंभ किया। वे प्रतिदिन स्नान करके, भक्ति भाव से भगवान का स्मरण करते हुए इंगुदी के तेल से दीप जलाते रहे। इस प्रकार उन्होंने पूरा मास अत्यंत निष्ठा और प्रेम से बिताया।

उनकी इस सच्ची भक्ति और व्रत के प्रभाव से उनके पाप नष्ट हो गए और मृत्यु के बाद वे स्वर्गलोक को प्राप्त हुए। वहाँ दिव्य सुखों का भोग करने के पश्चात्‌ वे पुनः पृथ्वी पर श्रेष्ठ कुल में जन्मे। वही मणिग्रीव आगे चलकर पराक्रमी राजा चित्रबाहु बना और उसकी पत्नी ही चन्द्रकला के रूप में पुनर्जन्म लेकर उसकी अर्धांगिनी बनी।

उन्हें जो ऐश्वर्य, सुख और निष्कंटक राज्य प्राप्त हुआ, वह सब पुरुषोत्तम मास में किए गए दीपदान का ही फल था।

बाल्मीकि मुनि ने अंत में कहा, “हे राजन्! पुरुषोत्तम मास में किया गया दीपदान मनुष्य के जीवन को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। जो इसे श्रद्धा और नियम से करता है, उसके लिए कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रहती।”


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 25 (कथारूप सार)

राजा दृढ़धन्वा ने विनम्र होकर पूछा, “हे मुनिवर! व्रत तो हमने सुना, पर उसका समापन किस प्रकार करना चाहिए?”

बाल्मीकि मुनि बोले, “हे राजन्! अब मैं तुम्हें पुरुषोत्तम मास के व्रत के समापन अर्थात्‌ उद्यापन की पवित्र विधि कथा के रूप में सुनाता हूँ, जिससे व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।”

मुनि बोले, “हे राजन्! जब पुरुषोत्तम मास पूर्ण होने को आए, तब कृष्ण पक्ष की अष्टमी, नवमी या चतुर्दशी तिथि में श्रद्धा और नियमपूर्वक उद्यापन करना चाहिए।”

उन्होंने आगे कहा, “प्रातःकाल उठकर, स्नान और नित्यकर्म करके, मन को एकाग्र कर भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करना चाहिए। फिर अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को आमंत्रित करना चाहिए। यदि संभव हो तो तीस, अन्यथा सात या पाँच ब्राह्मण भी पर्याप्त हैं।”

मुनि ने विस्तार से समझाते हुए कहा, “मध्याह्न में एक पवित्र मंडल बनाकर उसके ऊपर चार कलश स्थापित करें। उन कलशों में भगवान के चार रूपों वासुदेव, बलराम, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध का आवाहन करें। बीच में राधिका सहित पुरुषोत्तम भगवान्‌ को स्थापित कर विधिपूर्वक पूजा करें।”

फिर उन्होंने कहा, “वैष्णव आचार्य को सम्मानपूर्वक बैठाकर, वस्त्र और आभूषण अर्पित करें। ब्राह्मणों से जप कराएं और चारों दिशाओं में दीपक जलाएं। इसके बाद श्रद्धा से भगवान्‌ को अर्घ्य अर्पित करें और उनके दिव्य स्वरूप का ध्यान करें श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी, हाथ में वंशी धारण किए, राधारानी के साथ विराजमान।”

राजा यह सब सुनकर अत्यंत भावविभोर हो गया।

बाल्मीकि मुनि ने आगे कहा, “पूजन के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराना अत्यंत आवश्यक है। उन्हें प्रेमपूर्वक विविध व्यंजन, फल, मिठाइयाँ अर्पित करें और मधुर वाणी से उनका सत्कार करें। इसके पश्चात दक्षिणा, वस्त्र, गौदान और ताम्बूल देकर उन्हें प्रसन्न करें।”

उन्होंने विशेष रूप से कहा, “यदि संभव हो तो श्रीमद्भागवत का दान अवश्य करें, क्योंकि यह साक्षात्‌ भगवान का स्वरूप माना गया है। इसका दान करने से अनगिनत पुण्य प्राप्त होते हैं और मनुष्य गोलोक धाम को प्राप्त करता है।”

फिर बोले, पूजा के अंत में भगवान्‌ से विनम्रता से क्षमा माँगनी चाहिए, “हे प्रभो! यदि मेरी पूजा में कोई त्रुटि रह गई हो तो कृपा कर उसे पूर्ण करें।” भगवान्‌ अच्युत की कृपा से सभी कमी पूर्ण हो जाती है।

उसके बाद ब्राह्मणों को विदा करके, अपने परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। रात्रि में जागरण कर, पुनः भगवान का स्मरण और पूजन करना चाहिए।

अंत में बाल्मीकि मुनि ने कहा, “हे राजन्! जो स्त्री या पुरुष इस प्रकार श्रद्धा और विधि से पुरुषोत्तम मास का उद्यापन करता है, वह जीवन भर सुख, समृद्धि और सौभाग्य प्राप्त करता है। उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में वह अपने पूर्वजों सहित भगवान के परम धाम गोलोक को प्राप्त होता है।”

यह सुनकर राजा दृढ़धन्वा अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसने निश्चय किया कि वह इस विधि से पुरुषोत्तम मास का व्रत और उसका उद्यापन अवश्य करेगा।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 26 (कथारूप सार)

बाल्मीकि मुनि बोले, हे राजन्! अब मैं तुम्हें पुरुषोत्तम मास के व्रत के अंत में किए जाने वाले नियम-त्याग की पवित्र विधि कथा के रूप में सुनाता हूँ।

राजा दृढ़धन्वा अत्यंत श्रद्धा से सुनने लगे।

मुनि बोले, “हे राजन्! जब पुरुषोत्तम मास का व्रत पूर्ण हो जाए, तब जो नियम व्रती ने पूरे मास में धारण किए हों, उनका विधिपूर्वक त्याग करना चाहिए। यह त्याग भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना व्रत का पालन।”

उन्होंने समझाया, “जो मनुष्य नक्तव्रत करता है, उसे अंत में ब्राह्मणों को भोजन कराकर सुवर्णदान करना चाहिए। जो अमावस्या के दिन भोजन का नियम रखता है, उसे गौदान देना चाहिए। जो आँवले के जल से स्नान करता है, वह दूध या दही का दान करे।”

राजा ने जिज्ञासा से पूछा, “हे मुनिवर! यदि कोई विशेष वस्तुओं का त्याग करे तो?”

बाल्मीकि जी बोले, “हे राजन्! जिसने फलों का नियम किया हो, वह फलों का दान करे। जिसने तेल त्यागा हो, वह घृत का दान करे, और जिसने घृत छोड़ा हो, वह दूध का दान करे। जो भूमि पर सोता रहा हो, वह गद्दे और शय्या का दान करे। जो पत्तल में भोजन करता रहा हो, वह ब्राह्मणों को भोजन कराकर घी और शक्कर का दान दे।”

फिर उन्होंने कहा, “मौनव्रत करने वाला सुवर्ण, तिल और घंटा का दान करे। जिसने जूते का त्याग किया हो, वह जूते का दान करे। जिसने नमक छोड़ा हो, वह विभिन्न रसों का दान करे। और जिसने दीप का त्याग किया हो, वह दीपदान करे।”

राजा यह सब सुनकर आश्चर्यचकित थे कि व्रत का हर नियम किसी न किसी दान से जुड़ा हुआ है।

बाल्मीकि मुनि ने आगे कहा, “हे राजन्! जो इस पुरुषोत्तम मास में भक्ति और नियम से व्रत करता है, वह वैकुण्ठ में स्थान पाता है। यदि कोई पूर्ण विधि से दान करने में समर्थ न हो, तो भी श्रद्धा से किया गया छोटा-सा दान व्रत को पूर्ण कर देता है।”

उन्होंने आगे एक गूढ़ रहस्य बताया, “इस मास में एक समय भोजन करना अत्यंत पवित्र माना गया है। जो व्यक्ति नियमपूर्वक भोजन करता है, उसके बड़े-बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं। जो एकादशी का व्रत करता है, वह अंत में भगवान के धाम को प्राप्त करता है।”

फिर मुनि ने कुशा की महिमा बताते हुए कहा, “कुशा अत्यंत पवित्र है। उनके मूल में ब्रह्मा, मध्य में भगवान्‌ विष्णु और अग्रभाग में भगवान्‌ शिव का निवास माना गया है। इसलिए बिना कुशा के कोई भी धार्मिक क्रिया पूर्ण नहीं मानी जाती।”

अंत में उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, “हे राजन्! व्रत के अंत में ब्राह्मणों को दक्षिणा देना अत्यंत आवश्यक है। यदि कोई दक्षिणा नहीं देता या नियमों का पालन नहीं करता, तो उसका व्रत अधूरा रह जाता है और वह पाप का भागी बनता है।”

इसलिए, हे राजन्! जो मनुष्य श्रद्धा, भक्ति और नियम से पुरुषोत्तम मास का व्रत करता है और अंत में विधिपूर्वक उसका त्याग करता है, वह इस संसार में सुख और समृद्धि प्राप्त कर अंत में भगवान के परम धाम को जाता है।

यह सुनकर राजा दृढ़धन्वा का हृदय श्रद्धा से भर गया और उसने निश्चय किया कि वह इस व्रत को पूरी विधि और नियम के साथ पूर्ण करेगा।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 27 (कथारूप सार)

श्रीनारायण बोले, “हे नारद! जब महर्षि बाल्मीकि ने पुरुषोत्तम मास का समस्त माहात्म्य सुनाया, तब राजा दृढ़धन्वा ने अत्यंत श्रद्धा से उन्हें प्रणाम किया और उनका विधिपूर्वक पूजन किया। मुनि ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया- तुम्हारा कल्याण हो, और सरयू नदी की ओर प्रस्थान कर गए।

राजा भी उन्हें विदा करके अपने महल लौटा, परंतु उसका मन अब संसार से विरक्त हो चुका था। उसने अपनी पत्नी गुणसुन्दरी से कहा, “हे प्रिये! यह संसार राग, द्वेष, लोभ और मोह से भरा हुआ है। यह शरीर भी नश्वर और अशुद्ध है। इससे क्या लाभ? मैं अब इस असार संसार को त्यागकर भगवान पुरुषोत्तम का स्मरण करते हुए वन को जाना चाहता हूँ।”

पति के वचन सुनकर पतिव्रता गुणसुन्दरी ने हाथ जोड़कर कहा, “हे नाथ! जहाँ आप होंगे, वहीं मेरा स्थान है। मैं भी आपके साथ वन जाऊँगी।”

राजा उसकी भक्ति से प्रसन्न हुआ और अपने पुत्र को राज्य सौंपकर पत्नी सहित वन को चला गया। दोनों हिमालय के समीप गंगा तट पर रहने लगे और पुरुषोत्तम मास आने पर कठोर तप करने लगे। राजा निराहार रहकर, एक पैर के अंगूठे पर खड़े होकर, आकाश की ओर दृष्टि लगाए भगवान श्रीकृष्ण का जप करने लगा। रानी भी उसकी सेवा में तत्पर रहकर भक्ति में लीन रही।

जब पुरुषोत्तम मास पूर्ण हुआ, तब वहाँ एक दिव्य विमान प्रकट हुआ। उसमें देवदूतों ने राजा और रानी को बैठने के लिए आमंत्रित किया। जैसे ही वे उसमें बैठे, उनका शरीर दिव्य हो गया और वे दोनों सीधे गोलोक धाम को प्राप्त हुए, जहाँ वे भगवान्‌ के समीप आनंदपूर्वक रहने लगे।

श्रीनारायण बोले, “हे नारद! पुरुषोत्तम मास की महिमा का वर्णन करना अत्यंत कठिन है। जो फल अनेक जन्मों की तपस्या से भी नहीं मिलता, वह इस मास के सेवन से सहज ही प्राप्त हो जाता है। चाहे कोई जानकर या अनजाने में भी इस मास में स्नान, दान या जप कर ले, उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।”

फिर श्रीनारायण ने एक अद्भुत उदाहरण दिया, “एक बार एक दुष्ट वानर ने अनजाने में पुरुषोत्तम मास के दौरान तीन दिन तक केवल स्नान कर लिया। उसी के प्रभाव से उसके समस्त पाप नष्ट हो गए और वह दिव्य शरीर धारण कर गोलोक को चला गया।”

यह सुनकर नारद मुनि अत्यंत आश्चर्यचकित हुए और बोले, “हे प्रभो! यह वानर कौन था? उसने ऐसा कौन-सा पुण्य किया था? कृपा करके विस्तार से बताइए।”

तब श्रीनारायण बोले, “हे नारद! पूर्वकाल में केरल देश में कदर्य नाम का एक अत्यंत लोभी ब्राह्मण रहता था। वह केवल धन संग्रह में लगा रहता था, कभी दान-पुण्य नहीं करता था। उसने न तो यज्ञ किया, न तीर्थ किया, न किसी की सहायता की। यहाँ तक कि अपने परिवार और समाज का भी उसने कभी भला नहीं किया।”

वह अत्यंत कृपण और छल-कपट से भरा हुआ था। एक बगीचे में रहकर वह वहाँ के फलों को चुराकर खाता और बेचता था, तथा झूठ बोलकर अपने स्वामी को धोखा देता था। इस प्रकार उसने जीवनभर केवल पाप ही किए।

जब उसकी मृत्यु हुई, तब यमदूत उसे पकड़कर यमलोक ले गए। वहाँ चित्रगुप्त ने उसके पापों का लेखा-जोखा सुनाया। उसके जीवन में कोई भी पुण्य नहीं था, केवल चोरी और विश्वासघात के पाप थे।

यह सुनकर धर्मराज क्रोधित होकर बोले, “यह दुष्ट कदर्य अपने पापों के कारण हजारों बार वानर योनि में जन्म लेगा।”

इस प्रकार, हे नारद! उस ब्राह्मण ने अपने पापों के कारण वानर योनि को प्राप्त किया। आगे की कथा में तुम सुनोगे कि कैसे उसी वानर को पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से मुक्ति प्राप्त हुई।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 28 (कथारूप सार)

श्रीनारायण बोले, “हे नारद! जब धर्मराज के दरबार में उस लोभी कदर्य ब्राह्मण के पापों का निर्णय हुआ, तब चित्रगुप्त ने अपने दूतों को आदेश दिया कि यह पहले प्रेतयोनि में जाकर अपने कर्मों का दुःख भोगे और उसके बाद वानर शरीर को प्राप्त हो।”

यमदूतों ने वैसा ही किया। वह कदर्य पहले प्रेत बनकर एक निर्जन, भयानक वन में भटकता रहा। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह अत्यंत कष्ट सहता रहा। अपने कर्मों का फल भोगने के बाद वह वानर योनि में जन्मा।

उसका जन्म एक अत्यंत सुंदर पर्वत पर हुआ, जहाँ शीतल जल से भरा एक पवित्र कुण्ड था, जिसे ‘मृगतीर्थ‘ कहा जाता था। यह तीर्थ इतना पवित्र था कि देवता भी वहाँ स्नान करने आते थे। कहा जाता है कि देवताओं ने दैत्यों के भय से कभी मृग रूप धारण कर वहाँ स्नान किया था, इसलिए उसका नाम मृगतीर्थ पड़ा।

किन्तु उस वानर का जीवन अत्यंत कष्टमय था। उसके मुख में भयंकर रोग था, जिससे वह कुछ भी खा नहीं पाता था। वह पेड़ों से फल तोड़ता, पर खा नहीं पाता और वे फल भूमि पर गिर जाते। भूख-प्यास से तड़पता हुआ वह इधर-उधर भटकता रहता।

समय बीतता गया और एक दिन संयोगवश पुरुषोत्तम मास आ गया। उस समय भी वह वानर रोग, भूख और पीड़ा से व्याकुल था।

एक दिन वह प्यास से व्याकुल होकर उस पवित्र कुण्ड के पास पहुँचा, परन्तु दुर्बलता के कारण जल भी नहीं पी सका। वह वृक्षों पर चढ़ता-उतरता रहा और अंततः कुण्ड के पास गिर पड़ा।

दशमी तिथि से लेकर चार दिनों तक वह वानर उस कुण्ड में लोट-पोट करता रहा। उसके शरीर पर बार-बार उस पवित्र जल का स्पर्श होता रहा।

पाँचवें दिन, मध्याह्न के समय, उसने उसी कुण्ड के किनारे अपने प्राण त्याग दिए।

जैसे ही उसने शरीर छोड़ा, उसी क्षण एक अद्भुत चमत्कार हुआ। उस पापी वानर का शरीर दिव्य हो गया। वह नीलकमल के समान श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी, रत्नों से अलंकृत, तेजस्वी दिव्य रूप में प्रकट हुआ।

उसी समय वहाँ एक दिव्य विमान प्रकट हुआ, जिसमें गंधर्व गान कर रहे थे, अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं और मधुर वाद्य बज रहे थे।

उस दिव्य दृश्य को देखकर वह चकित रह गया और मन ही मन सोचने लगा, “मैं तो अत्यंत पापी था, मैंने कोई पुण्य नहीं किया, फिर मुझे यह दिव्य सुख कैसे प्राप्त हुआ?”

तभी भगवान् के दूत वहाँ आए और हाथ जोड़कर विनम्रता से बोले, “हे महाभाग! तुमने पुरुषोत्तम मास में अनजाने में भी इस पवित्र तीर्थ में स्नान किया। उसी के प्रभाव से तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो गए। यह दिव्य विमान उसी पुण्य का फल है।”

यह सुनकर वह आश्चर्य और आनंद से भर गया।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 29 (कथारूप सार)

जब उस पापी कदर्य ब्राह्मण ने वानर शरीर त्यागकर दिव्य देह धारण की, तब भगवान के दूत पुण्यशील और सुशील उससे बोले, “हे महाभाग! अब विलम्ब क्यों करते हो? चलो, हम तुम्हें गोलोक ले चलें, जहाँ पुरुषोत्तम भगवान का साक्षात् सान्निध्य प्राप्त होता है।”

यह सुनकर कदर्य अत्यन्त विनम्र होकर बोला, “हे प्रभो! मैंने जीवन भर अनेक पाप किए हैं। मेरे समान पापी का उद्धार कैसे हुआ? मैंने कौन-सा पुण्य किया, जिससे मुझे यह दिव्य शरीर और यह महान लोक प्राप्त हुआ?”

तब हरिदूतों ने मुस्कराकर कहा, “हे कदर्य! यही पुरुषोत्तम मास का अद्भुत प्रभाव है। तुमने अज्ञानवश ही इस मास में महान तप कर लिया। तुम्हारे मुख में रोग था, इसलिए तुमने अनजाने में उपवास किया। तुमने वृक्षों से फल तोड़कर भूमि पर फेंके, जिससे अन्य जीवों का पेट भरा। यह परोपकार बन गया। भूख-प्यास, शीत और धूप सहते हुए तुमने कठोर तप सहा। और सबसे बढ़कर, तुम उस पवित्र तीर्थ में कई दिनों तक जल में लोटते रहे, जिससे तुम्हें स्नान का पुण्य प्राप्त हुआ। इस प्रकार बिना जाने ही तुमसे ऐसा महान व्रत हो गया, जिसने तुम्हारे समस्त पापों को नष्ट कर दिया।”

यह सुनकर कदर्य आश्चर्य और आनन्द से भर गया। उसने उस तीर्थ, पर्वत, वन और वृक्षों को प्रणाम किया और विनम्रतापूर्वक दिव्य विमान में बैठ गया। देवताओं ने पुष्पवृष्टि की, गन्धर्वों ने गीत गाए और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। इस प्रकार वह परम आनन्दमय गोलोक को प्राप्त हुआ, जहाँ न दुःख है, न जन्म-मरण का भय।

इसके बाद नारद मुनि ने भगवान से पूछा, “हे प्रभो! आपने प्रातःकाल के कर्तव्यों का वर्णन किया, अब कृपया बताइए कि दिन और रात्रि में मनुष्य को कैसे आचरण करना चाहिए?”

तब श्रीनारायण ने गृहस्थ धर्म का उपदेश देते हुए कहा कि मनुष्य को संध्या, तर्पण और पंचमहायज्ञ करना चाहिए। अतिथि को देवता मानकर उसका सत्कार करना चाहिए और भिक्षु-ब्रह्मचारी को पहले भोजन देना चाहिए। स्वयं शुद्ध और संयमपूर्वक भोजन करना चाहिए। भोजन के पश्चात् भगवान का स्मरण, शास्त्र-श्रवण और आत्मचिन्तन करना चाहिए।

सायंकाल में संध्या-वंदन, जप और हवन करना चाहिए और रात्रि में धर्मपूर्वक आचरण करते हुए विश्राम करना चाहिए।

अंत में श्रीनारायण ने कहा कि अहिंसा, सत्य, दया, दान और संयम यही गृहस्थ धर्म के मूल स्तम्भ हैं। जो मनुष्य इनका पालन करता है, वही सच्चा धर्मात्मा है और जीवन में परम कल्याण को प्राप्त करता है।

इस प्रकार यह कथा बताती है कि पुरुषोत्तम मास का प्रभाव इतना महान है कि अनजाने में किया गया छोटा-सा पुण्य भी मनुष्य को मोक्ष के मार्ग पर ले जा सकता है।

इस प्रकार, केवल पुरुषोत्तम मास में अनजाने में किए गए स्नान मात्र से भी वह पापी कदर्य ब्राह्मण वानर योनि से मुक्त होकर दिव्य लोक को प्राप्त हुआ।


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 30 (कथारूप सार)

नारदजी ने विनम्र भाव से भगवान नारायण से पूछा, “हे प्रभो! आपने पतिव्रता स्त्रियों की महिमा तो बताई, अब उनके लक्षणों को विस्तार से कहिए।” यह सुनकर भगवान नारायण मुस्कुराए और बोले, “हे नारद! सुनो, मैं तुम्हें सच्ची पतिव्रता स्त्री के गुणों का वर्णन करता हूँ।‘

उन्होंने कहा कि सच्ची पतिव्रता स्त्री वही है, जो अपने पति को ही परम देवता मानती है। चाहे पति रूपवान हो या कुरूप, धनी हो या निर्धन, ज्ञानी हो या अज्ञानी, वह हर परिस्थिति में उसके प्रति श्रद्धा, सेवा और समर्पण का भाव रखती है। वह अपने मन, वचन और कर्म से पति का आदर करती है और कभी भी कठोर वाणी का प्रयोग नहीं करती।

भगवान ने आगे बताया कि ऐसी स्त्री अपने मन को संयम में रखती है। वह किसी अन्य पुरुष की ओर आकर्षित नहीं होती, न ही किसी प्रकार के प्रलोभन से विचलित होती है। उसकी निष्ठा इतनी दृढ़ होती है कि वह केवल अपने पति के सुख-दुख में ही अपना जीवन समर्पित कर देती है। पति के प्रसन्न होने पर वह प्रसन्न होती है और उसके दुःख में स्वयं भी दुःखी हो जाती है।

पतिव्रता स्त्री का जीवन अत्यंत मर्यादित और अनुशासित होता है। वह घर के कार्यों को कुशलता से संभालती है, सास-ससुर की सेवा करती है, और परिवार में प्रेम एवं शांति बनाए रखती है। वह अपने व्यवहार से घर को स्वर्ग समान बना देती है। पति के आने पर उसका आदर करना, समय पर भोजन देना, मधुर वचन बोलना, ये उसके स्वभाव में ही शामिल होते हैं।

भगवान नारायण ने यह भी बताया कि ऐसी स्त्री अपने आचरण में अत्यंत सावधानी रखती है। वह व्यर्थ हँसी-मजाक, क्रोध, ईर्ष्या और असंयम से दूर रहती है। यदि पति कहीं बाहर चला जाए, तो वह उसके कल्याण के लिए प्रार्थना करती है और स्वयं सादगी से जीवन बिताती है।

उन्होंने गर्भवती स्त्री के लिए भी नियम बताए, उसे सदैव शुद्ध, प्रसन्न और संयमित रहना चाहिए, ताकि उत्तम संतान की प्राप्ति हो। वहीं विधवा स्त्री के लिए भी संयम, साधना और सादगीपूर्ण जीवन को श्रेष्ठ बताया गया है।

भगवान नारायण ने अंत में कहा, “हे नारद! इस संसार में पति के समान स्त्री के लिए कोई देवता नहीं है। पति की प्रसन्नता से ही स्त्री को सुख, समृद्धि, संतान और यश प्राप्त होता है। जो स्त्री अपने धर्म का पालन करती है, वह न केवल इस लोक में सुख भोगती है, बल्कि परलोक में भी उच्च स्थान प्राप्त करती है।”


पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 31 (कथारूप सार)

सूतजी बोले, “हे विप्रों! जब नारद मुनि ने पतिव्रता धर्म का अद्भुत वर्णन सुना, तो उनके हृदय में एक और जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उन्होंने विनम्रता से भगवान नारायण से पूछा, “हे प्रभो! आपने अनेक दानों का महत्व बताया, परन्तु काँसे के सम्पुट के दान को सबसे श्रेष्ठ कहा है। कृपा करके उसके रहस्य को विस्तार से बताइए।”

भगवान नारायण ने प्रसन्न होकर कहा, “हे नारद! प्राचीन काल में एक बार माता पार्वती ने भी पुरुषोत्तम मास का व्रत किया था। व्रत की समाप्ति पर उन्होंने भगवान शिव से पूछा कि इस व्रत को पूर्ण करने के लिए कौन-सा दान सर्वोत्तम है, जिससे सम्पूर्ण फल प्राप्त हो।”

तब भगवान शिव ने गहन ध्यान कर उत्तर दिया, “हे पार्वती! पुरुषोत्तम मास इतना महान है कि इसमें अन्य सभी दान गौण हो जाते हैं। इस व्रत की पूर्णता के लिए ‘सम्पुट दान‘ का विधान है। ब्रह्माण्ड के समान उस सम्पुट का दान अत्यंत दुर्लभ है, इसलिए उसके स्थान पर काँसे का सम्पुट बनाकर उसमें 30 मालपुए रखकर, विधिपूर्वक पूजन कर, योग्य ब्राह्मण को अर्पित करना चाहिए। यदि सामर्थ्य हो तो ऐसे 30 सम्पुटों का दान करना उत्तम माना गया है।”

भगवान शिव के वचनों को सुनकर माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने श्रद्धापूर्वक वही दान कर अपने व्रत को पूर्ण किया।

यह कथा सुनकर नारद मुनि का हृदय भक्ति से भर उठा। उन्होंने कहा, “हे प्रभो! अब मुझे पूर्ण विश्वास हो गया है कि पुरुषोत्तम मास सभी साधनों में श्रेष्ठ है। केवल इसका श्रवण ही मनुष्य के पापों का नाश कर देता है, तो जो श्रद्धा और विधि से इसका पालन करता है, उसके पुण्य का तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता।”

सूतजी आगे कहते हैं, जो मनुष्य इस भारतभूमि में जन्म लेकर भी इस पवित्र पुरुषोत्तम मास का पालन नहीं करते, वे जीवनभर दुःखों के चक्र में फँसे रहते हैं। इसलिए इस मास में सत्य बोलना, दान देना, ब्राह्मणों का सत्कार करना और भगवान का भजन करना अत्यंत आवश्यक है।

इस मास में विशेष रूप से भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान और पूजन करना चाहिए। श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी, मुरलीधर, राधिका सहित पुरुषोत्तम भगवान का स्मरण करने से मनुष्य के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

सूतजी ने यह भी कहा कि इस माहात्म्य का श्रवण, पठन और लेखन अत्यंत फलदायक है। जो इसे लिखकर, सजाकर ब्राह्मण को दान देता है, वह अपने कुलों का उद्धार कर दुर्लभ गोलोक धाम को प्राप्त करता है। यहाँ तक कि एक श्लोक का श्रवण भी महान पापों को नष्ट करने वाला है।

यह दिव्य कथा सुनकर नैमिषारण्य के सभी ऋषि-मुनि अत्यंत प्रसन्न हो उठे। उन्होंने सूतजी की महिमा का गुणगान किया और उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे सदा इसी प्रकार भगवान की पावन कथाओं का प्रसार करते रहें।

इस प्रकार यह पुरुषोत्तम मास का माहात्म्य कल्पवृक्ष के समान है। जो भी श्रद्धा से इसका आश्रय लेता है, वह अपने सभी अभिलाषित फल प्राप्त कर अंततः भगवान के दिव्य धाम को प्राप्त होता है।


Source: narayanseva.org

Read in Hindi - Purushottam Maas Mahatmya Katha in 3 parts :







No comments:

Post a Comment

Leave Your FootPrint Below

Newer Post Older Post Home

Subscribe via email

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

You May Like To See

BLUEiCYMiND Life Quotes

Scroll Ads

About Me

My photo
Mumbai, Maharastra, India
MY NAME IS HITENDRA V BARI. Masters in Physics and then working as a Digital Marketing Manager (SEO, SEM, SMM and Research analyst). I'm regular , parttime blogger like to blogs on various trending, on going topics but in different way. One of my biggest dream is that to give speech on stage, with a lakhs of people viewing me live around the world.

Followers

Blueicymind Archives


Recent Comments